दोहरा चरित्र
रात से ही बहुत बारिश हो रही थी। हमेशा की तरह मेरी आँखें सुबह 4:30 बजे खुल गईं। मैंने खिड़की खोलकर देखा तो जोर की बारिश हो रही थी। मैं वहीं खिड़की के पास अपनी डायरी ले कर कुछ लिखने बैठ गई, तभी मेरी बेटी मेरे बगल में आकर बैठ गई। मैंने डायरी रखकर अपनी बेटी के सिर को अपनी गोदी में रख लिया। मैंने महसूस किया कि मेरी बेटी का सिर गर्म है, शायद मौसम बदलने के कारण बुखार हो गया था।
मैंने घड़ी में देखा कि 8 बजने वाला था। मैंने मन ही मन सोचा, “शायद सरिता (मेरी काम वाली) आज नहीं आएगी,” इसलिए मैंने डायरी को टेबल पर रख दिया और घर के काम में लग गई। घर के काम खत्म कर, मैं सुबह के नाश्ते की तैयारी करने लगी। सब्जी काटने के लिए छुरी उठाया ही था कि सविता साड़ी को घुटनों तक उठाए हुए अपने पल्लू से पानी झाड़ते हुए घर के अंदर आई। सविता को देख कर मैंने थोड़ी राहत की सांस ली और सविता से बोली- “तू आ गई सविता, मैंने तो सोच लिया था कि तू आज नहीं आएगी।”
सविता- “अरे, कैसे नहीं आती, बारिश के मौसम में तो रोज बारिश होती रहेगी, तो मैं कितने दिन नहीं आऊँगी? और आपको भी तो स्कूल के लिए निकलना होगा।”
सविता की बात सुनकर- हाँ जाना तो था लेकिन... अभी मैंने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि मेरी लैंडलॉर्ड रेनू आंटी हांफती हुई मेरे घर में दाखिल हुई। रेनू आंटी के हाथों में स्ट्रिप बंधी हुई थी, और वह देखने में ही बीमार लग रही थीं। रेनू आंटी की हालत अस्त-व्यस्त थी। रेनू आंटी को देख कर मैं आगे बढ़ कर उन्हें सोफे पर बैठाते हुए बोली- “रेनू आंटी, आपकी तबियत ठीक नहीं है? क्या हुआ आपको?”
रेनू आंटी हांफते हुए बोली- “हाँ प्रीटी, रात अचानक बीपी लो हो गया था, सुबह चार बजे हॉस्पिटल से घर आई हूँ, रात भर पानी चढ़ा है मुझे।”
मैं गुस्से से बोली- “अरे आंटी, इतना सब हो गया और आपने मुझे फोन नहीं किया?”
रेनू आंटी दिलासा देते हुए बोली- “सुमन आ गई थी, इसलिए मैंने सोचा तुम्हें क्यों परेशान करू।”
प्रीटी- “आप नीचे क्यों आईं? मुझे फोन कर देतीं, मैं ही ऊपर चली आती।”
रेनू आंटी मुस्कुराते हुए बोली- “अरे, अभी ठीक हूँ मैं। वो, मैं सविता से बात करने आई थी। सुमन बोल कर गई है कि मैं कुछ दिनों के लिए सविता को घर के काम करने के लिए रख लूँ। सविता खाना भी बना देगी।”
रेनू आंटी की बात सुनकर मैं आश्चर्य से कभी रेनू आंटी का तो कभी सविता का चेहरा देखने लगी। रेनू आंटी सविता से अपने घर का काम करने के लिए बोल रही हैं, वो भी खाना बनाने के लिए? अभी कुछ दिन पहले तक रेनू आंटी मेरे घर चाय तक नहीं पीती थीं। शुरू-शुरू में तो मुझे समझ नहीं आया कि रेनू आंटी मेरे घर चाय क्यों नहीं पीती थीं। तब मुझे मेरे साथ काम करने वाली एक कॉलिंग महिमा जी ने बताया कि रेनू आंटी मेरे घर चाय इसलिए नहीं पीती हैं क्योंकि मेरे घर सविता चाय बनाती हैं। उस दिन से मैं सतर्क हो गई थी। जब भी रेनू आंटी मेरे घर में आतीं, मैं खुद उनके लिए चाय बनाती, सविता से नहीं बनवाती थी। और आज रेनू आंटी खुद ही सविता से खाना बनवाने के लिए बोल रही थीं।
रेनू आंटी की बात सुनकर सविता मेरी ओर देखने लगी और कुछ बोलने ही वाली थी कि मैंने आँखों से सविता को चुप रहने का इशारा करते हुए बोला- “जाओ सविता आंटी जी के घर, आज तो मैंने घर का सारा काम कर लिया है, कल से थोड़ा जल्दी आ जाना।”
सविता बोली- “लेकिन प्रीति दीदी, आपको स्कूल जाने के लिए देर हो जाएगी?”
मैं बोली- “आज मुझे स्कूल नहीं जाना है, बेटी की तबियत ठीक नहीं है।”
मेरी बात सुनकर सविता चुपचाप रेनू आंटी के साथ चली गई, और मैं फिर से अपने काम में लग गई। किचन का काम खत्म कर मैंने अपने लिए एक कप चाय बनाई और सोफे पर आकर बैठ गई और सोचने लगी, इंसान भी कितना मतलबी होता है। अपने मतलब के लिए नियम बनाता है और अपने मतलब के लिए सारे नियम तोड़ भी देता है। अभी कुछ दिन पहले जब मैं रेनू आंटी के घर किरायेदार बन कर आई थी, तब रेनू आंटी बहुत नियम-कानून मानती थीं। उनकी बहू मानसी बैंक में नौकरी करती थी। दोनों सास-बहू में रोज घर के काम को लेकर झगड़ा होता था। मानसी जी ने तंग आकर अपना ट्रांसफर दूसरे शहर में करा लिया। आखिर वह भी एक इंसान ही हैं, कोई मशीन नहीं। मैं भी रेनू आंटी से थोड़ी दूरी बना कर रखती थी, क्योंकि मुझे उनके ख्यालात दकियानूसी लगते थे। समय परिवर्तनशील होता है, समय बदल गया। रेनू आंटी की बेटी सुमन भी टीचर बन गई। पहले कभी भी रेनू आंटी किसी भी समय सुमन को अपने घर मदद के लिए बुला लेती थीं, लेकिन जब से सुमन टीचर बन गई थी, तब से सुमन का भी हर वक्त मायके आना संभव नहीं था। और सुमन ने भी अपने हेल्प के लिए एक कामवाली लगा ली थी। और आज सुमन ने भी रेनू आंटी को एक हेल्पर रखने की सलाह दे दी। चाय का कप लिए मैं अभी अपने ख्यालों में ही खोई थी कि सविता हँसते हुए सामने आकर खड़ी हो गई। सविता को देख कर मैंने पूछा- “रेनू आंटी के घर का काम खत्म हो गया सविता?”
सविता हँसते हुए- “हाँ दीदी, झाड़ू-पोछा करने के बाद रोटी-सब्जी बना कर खिला दिया, दवा और पानी दे कर आ रही हूँ। दोपहर में जाकर थोड़ा मालिश भी कर दूँगी, तबियत ज्यादा खराब है माजी की।”
इतना बोलकर सविता कपड़े धोने के लिए मशीन में डालने लगी और मैं एक बार फिर अपनी डायरी ले कर लिखने बैठ गयी........
अल्पना सिंह
Sunder kahani
ReplyDeleteयह कहानी समाज में व्याप्त सामाजिक वर्ग और मानसिकता के बीच के अंतर को सरल और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करती है। कहानी की मुख्य पात्र, प्रीटी, एक आम गृहिणी है, जो अपने दिनचर्या के कार्यों और जीवन की चुनौतियों का सामना कर रही है। कहानी के माध्यम से लेखक ने यह संदेश दिया है कि इंसान के स्वार्थ और परिस्थिति के हिसाब से उसकी सोच और व्यवहार बदलते हैं।
ReplyDeleteकहानी का मुख्य विषय मानव स्वभाव और समय के साथ मानसिकता में बदलाव है। शुरुआत में रेनू आंटी की दृष्टि से प्रीटी के घर की कामवाली सविता को एक निम्न स्तर का व्यक्ति माना जाता था, लेकिन परिस्थितियाँ बदलने पर वही रेनू आंटी अब सविता से मदद लेने को मजबूर हो जाती हैं। यह बदलाव दिखाता है कि स्वार्थ और परिस्थितियाँ किसी के विचारों और धारणाओं को बदल सकती हैं।
कहानी में प्रीटी का किरदार एक संवेदनशील और समझदार महिला के रूप में उभरता है, जो हर परिस्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से संभालती है। वहीं, सविता का किरदार ईमानदारी और मेहनत का प्रतीक है, जो अपने काम को पूरी निष्ठा से करती है। रेनू आंटी का किरदार भी यथार्थवादी है, जो समाज में प्रचलित धारणाओं और मानसिकता का प्रतीक है। कहानी का संवाद सहज और सजीव है।
कहानी का संदेश: कहानी यह सिखाती है कि समाज में हमारे द्वारा बनाए गए नियम और पूर्वाग्रह समय और परिस्थितियों के हिसाब से बदल सकते हैं। जीवन में मानवीय संवेदनाओं का महत्व और एक दूसरे की मदद करने की भावना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
समग्र रूप से, यह कहानी साधारण लेकिन गहरे अर्थ से भरी हुई है, जो मानव स्वभाव के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।