मेरी नई किताब — “मर्यादा”
मेरी नई किताब — “मर्यादा” “मर्यादा” लिखना मैंने 2017 में ही शुरू कर दिया था। तब मेरे पास इस तरह की कोई कहानी लिखने की योजना नहीं थी। मैं “नीलमणि” और “श्रीधर पंडित” लिखने में व्यस्त थी। तभी एक ऐसी घटना घटी, जिसने मुझे भीतर तक हिला दिया। मेरे एक करीबी रिश्तेदार के साथ हुई घरेलू हिंसा की उस घटना ने मुझे बहुत गहराई तक झकझोर दिया था। लेकिन उस घटना से भी ज्यादा मुझे अपने आसपास की महिलाओं की सोच ने परेशान किया था—घरेलू हिंसा को सही ठहराना, उसे सहना और फिर उसी सहने को स्त्री का धर्म मान लेना। मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पाती थी। शायद इसलिए मेरी कलम अनायास ही डायरी के पन्नों पर चलने लगी। मैं जब अविवाहित थी, तब अपने घर में घरेलू हिंसा का वैसा रूप मैंने नहीं देखा था। गुस्सा मैंने देखा था। मेरे पापा गुस्से वाले थे और मेरी माँ उतनी ही सहनशील। हमारे घर में दादाजी का अनुशासन था, दादी का स्नेह था। हम संयुक्त परिवार में रहते थे और परिवार में शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता था। लेकिन मारपीट जैसी घटना—नहीं, बिल्कुल नहीं। शायद इसीलिए जब मैंने अपने आसपास ऐसी घटनाएँ देखीं, तो उन्हें स्वीक...


















