जब रोशनी चली गई,

 



जब रोशनी चली गई

शहर में रहने वालों के लिए बिजली का चले जाना अब कोई बड़ी घटना नहीं रह गई थी। कुछ देर के लिए बिजली गई नहीं कि इन्वर्टर अपने आप चालू हो जाता था। मोबाइल की बैटरी कम हुई नहीं कि चार्जर हाथ में आ जाता था। इंटरनेट धीमा हुआ तो मोबाइल डेटा था।

हमारी जिंदगी इतनी सुविधाओं की आदी हो चुकी थी कि कई बार हमें एहसास ही नहीं होता था कि हम इन सुविधाओं पर कितने निर्भर हो चुके हैं।

मैं भी उन्हीं लोगों में से एक थी।

मैंने जब से होश संभाला था, अपने आसपास बिजली, पंखे, टीवी, मोबाइल और दूसरी सुविधाओं को सहज रूप से मौजूद पाया था। मायका हो या ससुराल, कभी ऐसा नहीं लगा कि इन चीजों के बिना भी जिंदगी चल सकती है।

सावन का महीना था। ससुराल के गाँव में पूजा रखी गई थी। जेठानी का फोन आया तो उन्होंने बड़े प्यार से गाँव आने के लिए कहा। पति शहर में नहीं रहते थे, इसलिए मैंने ड्राइवर के साथ गाँव जाने का फैसला कर लिया।

गाँव पहुँची तो पूजा शुरू हो चुकी थी। मैं जल्दी से पूजा में जाकर बैठ गई।

करीब दो घंटे तक पूजा चली। पूजा खत्म हुई तो घर की औरतों के साथ बैठकर बातें शुरू हो गईं। गाँव के घरों में समय जैसे थोड़ी धीमी चाल से चलता है। कब दोपहर ढल गई और शाम करीब आ गई, पता ही नहीं चला।

तभी मोबाइल की घंटी बजी।

पति का फोन था।

मैं उठकर थोड़ी दूर चली गई और उनसे बातें करने लगी। बातों-बातों में समय का पता ही नहीं चला। पति ने अपनी भाभियों से भी बात की। घर-परिवार की बातें होती रहीं।

जब फोन रखा तो आदतन मेरी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर गई।

बैटरी लगभग खत्म थी।

मैंने सामने बैठी जेठानी की बेटी सीमा से कहा, “सीमा, मेरा मोबाइल चार्ज में लगा देना।”

सीमा ने मेरी तरफ देखा और हँसते हुए बोली, “चाची जी, लाइट नहीं है।”

मैंने सहजता से कहा, “तो इन्वर्टर से लगा दो।”

इस बार वह और जोर से हँसी।

“चाची जी, इन्वर्टर भी डिस्चार्ज है।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“वो भी?”

मेरी जेठानी मुस्कुराईं।

“अरे छोटकी, पूरे गाँव में दो दिन से लाइट नहीं है।”

“दो दिन से?”

मेरी आवाज में सचमुच हैरानी थी।

सीमा ने बताया, “दो दिन पहले बहुत तेज आँधी आई थी। ट्रांसफॉर्मर के ऊपर बड़ा-सा पेड़ गिर गया। ट्रांसफॉर्मर खराब हो गया। बिजली वाले आए थे, लेकिन अभी तक ठीक नहीं हुआ।”

मैंने अपना मोबाइल फिर देखा।

कुछ प्रतिशत बैटरी बची थी।

अचानक मुझे लगा जैसे मेरे हाथ में रखा छोटा-सा मोबाइल मेरे लिए बेकार होता जा रहा है। न नेटवर्क का भरोसा था, न बिजली का और न बैटरी का।

मैंने मोबाइल एक तरफ रख दिया।

शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। घर के बाहर अँधेरा गहराने लगा था। गाँव में कहीं-कहीं लालटेन और छोटे बल्बों की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

मैं चुपचाप कमरे में आकर बैठ गई। मेरा मन नहीं लग रहा था। मुझे हर वक्त कुछ लिखने-पढ़ने की आदत थी। घर पर होती तो लैपटॉप पर लिखती या पढ़ती रहती और बाहर होती तो मोबाइल ही मेरा सहारा होता। आज दोनों ही मेरे किसी काम के नहीं थे।

घर के बाकी लोग अपने-अपने काम में लगे थे और मैं बेकार-सी इधर-उधर टहल रही थी।

तभी मेरी नजर कमरे के एक कोने पर पड़ी।

वहाँ कुछ किताबें रखी थीं।

मैंने एक किताब उठाई और दीये की टिमटिमाती रोशनी में जाकर बैठ गई।

पन्ने पलटे।

अजीब-सी शांति महसूस हुई।

किताब को पढ़ने के लिए मुझे न बिजली चाहिए थी, न इंटरनेट, न नेटवर्क और न चार्जर।

बस मेरी आँखें और मन चाहिए था।

मैं मुस्कुराई।

जिस चीज को मैं हमेशा साधारण समझकर घर के किसी कोने में रख देती थी, उस शाम वही किताब मुझे सबसे ज्यादा उपयोगी लग रही थी।

मोबाइल की स्क्रीन बंद हो सकती थी।

इंटरनेट का कनेक्शन टूट सकता था।

बिजली जा सकती थी।

लेकिन किताब मेरे हाथ में थी।

मैंने पहला पन्ना खोला और पढ़ना शुरू कर दिया।

बाहर अँधेरा बढ़ता जा रहा था और कमरे के भीतर एक अलग तरह की रोशनी फैल रही थी।

वह रोशनी बिजली की नहीं थी।

वह शब्दों की रोशनी थी।

उस रात पहली बार मुझे लगा कि हम आधुनिक होने की दौड़ में बहुत कुछ पा रहे हैं, लेकिन शायद कुछ ऐसी चीजों को भूलते जा रहे हैं, जिनकी जरूरत हमें तब महसूस होती है, जब हमारी सारी आधुनिक सुविधाएँ हमारा साथ छोड़ देती हैं।

मैंने किताब बंद की और देर तक उसके ऊपर हाथ रखे बैठी रही।

मन में एक ही विचार था—

बिजली चली जाए तो अँधेरा होता है,

लेकिन किताबें हों तो मन कभी पूरी तरह अँधेरे में नहीं रहता।

लेखिका- अल्पना सिंह 

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