उफ़! ये सपने भी ना…
“आज से लगभग चार साल पहले लिखा हुआ यह संस्मरण आज अचानक फिर से पढ़ने को मिला। पढ़ते ही उस सपने की पूरी यात्रा और उस समय का डर एक बार फिर आँखों के सामने घूम गया। सोचा, क्यों न इसे आप सभी के साथ एक बार फिर साझा किया जाए… क्योंकि सपनों में इंसान न जाने कहाँ-कहाँ का सफर कर आता है। 😊”
उफ़! ये सपने भी ना…
घड़ी में टाइम देखा—5:30 बज गए थे।
“अरे! इतना टाइम हो गया?”
मैं जल्दी-जल्दी अपना बैग उठाकर सड़क पर निकल आई। बाहर निकलते ही महसूस हुआ कि काफी अँधेरा हो चुका था। ठंड भी बहुत थी और हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। सड़क पर दूर-दूर तक एक भी आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। चारों ओर एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था।
मैं तेज कदमों से अपने घर की ओर बढ़ने लगी।
तभी मुझे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
मैंने पीछे पलटकर देखा। चार लोग थे। उनकी चाल देखकर लग रहा था, जैसे वे नशे में हों।
उन्हें देखकर मेरे माथे पर पसीना आ गया। मैं अंदर तक हिल गई। किसी तरह अपने डर पर काबू करते हुए मैंने कदम और तेज कर दिए। कुछ दूर जाकर मैं एक गली में घुस गई।
अचानक मेरे कदम रुक गए।
“ये मैं किस गली में आ गई?”
शायद डर के कारण मैं गलत गली में घुस आई थी। लगता था, मैं रास्ता भटक गई हूँ।
“ओह! अब क्या होगा?”
पीछे से कदमों की आहट और तेज सुनाई देने लगी। शायद वे लोग मेरे काफी करीब आ गए थे। मेरे जेहन में न जाने कितने बुरे ख्याल आने लगे।
मैंने ध्यान से चारों ओर देखा।
गली कुछ जानी-पहचानी सी लग रही थी।
“अरे! ये तो मेरी बचपन की सहेली रंजू की गली है।”
मुझे थोड़ी उम्मीद जगी। मैं तेज कदमों से रंजू के घर की ओर बढ़ गई। वहाँ पहुँचकर देखा तो दरवाजे पर ताला लगा हुआ था।
“ओह…”
तभी याद आया—रंजू की तो शादी हो चुकी है।
लेकिन उसके मम्मी-पापा और भाई कहाँ गए? शायद कहीं बाहर गए होंगे।
मेरे पास सोचने का समय नहीं था। मैं तेज कदमों से आगे बढ़ गई। सामने एक बड़ी-सी दीवार दिखाई दी। मैं उसके पीछे जाकर छिप गई।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। डर के मारे मेरे हाथ-पैर काँप रहे थे। इतनी ठंड में भी मेरे शरीर से पसीना बह रहा था। मैं बार-बार सिर घुमाकर चारों ओर देखने लगी।
कदमों की आहट लगातार नजदीक आती जा रही थी।
जैसे-जैसे वे कदम मेरे पास आते जा रहे थे, वैसे-वैसे मेरी हिम्मत जवाब देती जा रही थी।
तभी मेरी नजर सामने पड़ी।
मेन रोड!
और मेन रोड पर… मेरी मम्मी!
शायद वे मुझे ही ढूँढ़ रही थीं।
मम्मी को देखते ही जैसे मेरे अंदर अचानक हिम्मत आ गई। मैंने पूरी ताकत लगाकर मेन रोड की ओर दौड़ लगा दी।
तभी—
मेरे पैर से कुछ टकराया। शायद कोई पत्थर था। मेरा पैर फिसला और मैं जोर से पेट के बल सड़क पर गिर पड़ी।
दर्द के बावजूद मैंने अपना सिर उठाया।
मेरे सामने वही चारों लोग खड़े थे।
उन्होंने मुझे चारों ओर से घेर लिया था।
मुझे बस उनके पैर दिखाई दे रहे थे… और उनके पैरों के बीच से दूर खड़ी मेरी मम्मी दिखाई दे रही थीं।
मैंने चीखने की कोशिश की—
“मम्मी…”
लेकिन मेरे मुँह से आवाज ही नहीं निकली।
डर के कारण आवाज मेरे गले में ही अटक गई थी।
मैं हाँफ रही थी। मेरे होंठ काँप रहे थे। मेरी साँसें उखड़ी हुई थीं।
मैंने एक बार फिर पूरी ताकत लगाई और पूरी शक्ति से चीखी—
“मम्मीऽऽऽऽऽ…!!!”
फिर मेरी आँखें बंद हो गईं।
जब मेरी आँखें खुलीं तो मैं अपने बिस्तर पर थी।
मेरी बेटी मुझे झकझोरकर जगा रही थी।
“मम्मी! क्या हुआ? आप क्यों चिल्ला रही थीं?”
मैं अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले पति देव की आवाज सुनाई दी—
“आज से ये लिखना-पढ़ना सब बंद! न जाने कहाँ से इसे लिखने का भूत सवार हो गया है। ये सब उसी का नतीजा है!”
मैं चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी, क्योंकि मैं अभी तक उस सपने के सदमे से बाहर ही नहीं आई थी।
मैं पसीने से नहाई हुई थी। मेरी साँसें अभी भी तेज चल रही थीं। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
मैंने मन ही मन सोचा—
“थैंक गॉड! ये सिर्फ एक सपना था।”
तभी मोबाइल की घंटी बजी।
बेटी ने कहा, “मम्मी, स्कूल से फोन आया है। बोल दूँ आज आप नहीं जाएँगी?”
मैंने तुरंत कहा, “नहीं, जा रही हूँ। मैं तैयार होने जा रही हूँ।”
मैंने अपने कपड़े उठाए और बाथरूम में चली गई।
लेकिन दिमाग में अभी भी वही सपना घूम रहा था।
मैं सोचने लगी—
“न जाने सपनों में भी इंसान कहाँ-कहाँ का सफर कर आता है…”
फिर अपने आप से कहा—
“उफ़! ये सपने भी ना…”
—अल्पना सिंह



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