“वो गली, वो तुम… और अधूरे एहसास”
“वो गली, वो तुम… और अधूरे एहसास”
एक बार जाना चाहती हूँ मैं उस गली में लौटकर,
जहाँ तुम हर शाम खड़े रहते थे,
अपनी आँखें बिछाए…
मुस्कुराते हुए, सबसे नज़रें बचाकर
देखते थे तुम… सिर्फ मुझे।
मेरी साँसें अटक जाती थीं,
जब तुम सिर झुकाए
मेरे बगल से गुजर जाते थे,
ऐसा लगता था मानो मुझे पहचानते ही नहीं हो…
लेकिन कुछ दूर आगे बढ़कर,
तुम्हारा पीछे मुड़ना,
शरारत भरी नज़रों से देखना,
और फिर धीरे से मुस्कुरा देना…
वो सब एक बार फिर से महसूस करना चाहती हूँ मैं।
जानती हूँ कि मुमकिन नहीं उन रास्तों पर लौटकर जाना,
फिर भी ये पागल मन,
ये बेचैन धड़कन,
जीना चाहती है एक बार फिर से उन एहसासों को…
चुपचाप, खामोशी से,
करना चाहती है ढेर सारी बातें खुद से,
और बताना चाहती है अपने जज़्बात,
अपनी झुकी हुई निगाहों से…
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Writer: Alpna Singh



Nice
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