अधूरे से ख़्वाब,

 


कुछ यादें मिटती नहीं…

बस हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती हैं… 


लिखकर कुछ अधूरे से ख़्वाब,

रख दिए थे डायरी में बंद करके…

सोचा था, वक्त की धूल में दबकर

वो खुद-ब-खुद मिट जाएंगे…


सालों बाद जब खुली वो डायरी,

तो हर पन्ना ख़ुशबू से महक उठा…

महक उठीं मेरी सांसें,

जाग उठे सोए हुए अरमान…


आज फिर वही जज़्बात,

मेरे अकेलेपन का साथी बन गए…

जिसे सालों से भुलाना चाहा,

जिसकी यादों को दिल से मिटाना चाहा…


वो ही एहसास आज,

मेरी तन्हाइयों का हमसफ़र बन गए…

खाली घर, सूना बिस्तर,

सूना-सा ये आंगन…


अकेली निहारती सूनी गलियों को,

उसकी यादों का सरमाया ही अब सहारा बन गया…

कुछ अधूरे ख़्वाब ही

इन बुझती सांसों का किनारा बन गया… 

-Alpna Singh ✍️

“मेरी कलम… मेरी पहचान…”

 

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