“तुमसे मिल कर”
दो अनजान लोग…
Facebook की भीड़ में,
हजारों चेहरों के बीच,
बस एक “सुनने वाला” ढूँढ़ते हुए…
उनकी कहानियाँ अलग हैं,
उनकी दुनियाएँ अलग हैं,
उनकी परेशानियाँ भी अलग हैं…
लेकिन एक चीज़ दोनों में समान है—
तन्हाई…
एक ऐसा खालीपन,
जो भीड़ के शोर में भी सुनाई देता है।
बातों का सिलसिला शुरू होता है—
पहले हल्का, फिर थोड़ा गहरा…
और धीरे-धीरे
दो अनजान लोग एक-दूसरे के हमदर्द बन जाते हैं।
लेकिन सवाल यह है—
क्या हर रिश्ते को कोई नाम देना जरूरी है?
क्या बिना मिले, बिना किसी वादे के,
सिर्फ एहसासों पर टिका रिश्ता
इतना गहरा हो सकता है कि जिंदगी बदल दे?
और अगर दिल किसी ऐसे इंसान से जुड़ जाए,
जिसे शायद जिंदगी में कभी अपना कह पाना संभव न हो,
तो उस रिश्ते का क्या होगा?
क्या वह रिश्ता अपनी मंजिल तक पहुँचेगा?
या फिर…
वह बनकर रह जाएगा
एक ऐसी अधूरी कहानी,
जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है,
जिया नहीं जा सकता…
यही है मेरी कहानी — “तुमसे मिल कर”
एक कहानी प्रेम की,
तन्हाई की,
दोस्ती की,
अनकहे एहसासों की
और उन रिश्तों की…
जिन्हें दुनिया शायद कोई नाम न दे पाए,
लेकिन दिल उन्हें कभी भूल नहीं पाता।
“तुमसे मिल कर” अब पाठकों के बीच आ चुकी है।
Ananta Press के माध्यम से प्रकाशित मेरी यह कहानी अब आपकी हो सकती है।
अगर आप भी कभी किसी ऐसे रिश्ते से गुजरे हैं,
जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सका…
लेकिन दिल आज भी उसे महसूस करता है,
तो शायद “तुमसे मिल कर” आपके लिए ही लिखी गई है।
किताब खरीदने का लिंक कमेंट में दिया हुआ है।
एक बार पढ़िएगा…
शायद कहानी खत्म होने के बाद भी
इसके कुछ किरदार आपके भीतर रह जाएँ।
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Alpna singh



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