“मेरी लेखन-यात्रा” एक आत्ममंथन…
“मेरी लेखन-यात्रा”
एक आत्ममंथन…
कभी-कभी पीछे मुड़कर देखती हूँ तो सोचती हूँ—आखिर मेरी लेखन-यात्रा शुरू कहाँ से हुई थी?
क्या मैंने कभी तय किया था कि मुझे लिखना है?
शायद नहीं।
मैंने तो बस लिखना शुरू किया था… अपने लिए।
जो बातें मन को अच्छी लगतीं, उन्हें सहेजने के लिए। जो बातें दिल को चुभ जातीं, उन्हें मन से बाहर निकालने के लिए। जो कुछ किसी से कह नहीं पाती, उसे कागज से कह देने के लिए।
इन दिनों मेरा मन अपने ही लेखन का आत्ममंथन करने में लगा है। सोचती हूँ, मैंने कब, कैसे और क्यों लिखना शुरू किया था? पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है, मेरी लेखन-यात्रा किसी किताब के पहले पन्ने से नहीं, बल्कि मेरी उस छोटी-सी डायरी से शुरू हुई थी, जिसके पन्नों पर मैं चुपचाप अपने मन की दुनिया उतार दिया करती थी।
मुझे याद है, छोटी-छोटी बातें जो अच्छी लगती थीं, या जो दिल को चुभ जाती थीं, उन्हें डायरी में लिख लेना मेरी आदत थी। खासकर तब, जब किसी की कोई बात दिल को चोट पहुँचा जाती। शायद उन भावनाओं को शब्दों में उतार देना ही मेरा अपना तरीका था उन्हें संभालने का।
और इन सबके बीच मेरी एक खास आदत थी—अपनी डायरी को छिपाकर रखना, ताकि कोई उसे पढ़ न ले। यह भी सच है कि मैं रोज डायरी नहीं लिखती थी, लेकिन अपनी भावनाएँ लिखती जरूर थी। कभी अकेले में फुर्सत मिलती तो उन पुराने पन्नों को निकालकर पढ़ लेती। कभी मन हल्का हो जाता, तो कभी उन्हीं लम्हों को याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।
फिर मेरी जिंदगी में मेरी बेटी आई।
उसके नन्हे कदमों की आहट और मीठे शब्दों की गूँज ने मेरी जिंदगी को जैसे खुशबू से भर दिया। मेरे अकेलेपन को उसकी मासूम खिलखिलाहट ने महका दिया।
कुछ दिनों तक मैं सब कुछ भूल गई और पूरी तरह अपनी बेटी के साथ व्यस्त हो गई। जब वह मेरी गोद में थी, उन दिनों मैंने कुछ लिखा हो—ऐसा कुछ मुझे याद नहीं। पहली बार माँ बनने और उसे संभालने में मैं इतनी व्यस्त थी कि डायरी तक भूल गई थी।
उसकी छोटी-छोटी हरकतें, उसकी बातें, उसकी शरारतें—सब मैं बहुत ध्यान से देखती थी। उसका चलना… फिर चलते-चलते लड़खड़ाकर गिर जाना… उसका तोतली आवाज़ में बोलना…
बस, यही सब देखना मेरा काम था।
उस समय मुझे कहाँ मालूम था कि मैं सिर्फ अपनी बेटी को बड़ा होते हुए नहीं देख रही थी…
मैं तो प्रकृति को अपने सामने आकार लेते हुए देख रही थी।
समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा। मेरी नन्ही-सी बेटी कब धीरे-धीरे बड़ी होने लगी, पता ही नहीं चला। उसकी मासूमियत और उसकी चहकती हुई दुनिया में मैं भी जैसे अपने बचपन के कुछ भूले हुए रंग फिर से जी रही थी।
और फिर एक दिन मेरी जिंदगी ने एक और खूबसूरत करवट ली—मेरी गोद में मेरा बेटा आ गया।
बेटी के बाद बेटे का आना मेरे लिए जैसे खुशियों की एक नई परत थी। अब घर में दो नन्ही दुनियाएँ थीं, दो अलग-अलग आवाजें थीं, दो तरह की शरारतें थीं और मेरे पास उन्हें निहारने के लिए जैसे पूरा जीवन भी कम था।
तब सचमुच लगा था—मेरा संसार पूरा हो गया है।
लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी कहाँ रहती है।
बच्चों की हँसी और उनकी खुशियों के बीच जिंदगी अपने दूसरे रंग भी दिखाती रही। अच्छे लोगों के साथ-साथ कुछ ऐसे लोग और कुछ ऐसे अनुभव भी जीवन में आते रहे, जिन्होंने मन को भीतर तक चोट पहुँचाई।
कभी-कभी अपनों की कही हुई बात भी इतनी गहरी चुभ जाती है कि मन अंदर तक छलनी हो जाता है। और अपनों की चोट तो ऐसी होती है, जिसे किसी से कह भी नहीं पाते।
शायद इसलिए कि कुछ दुख शिकायत नहीं माँगते… बस एक ऐसे साथी की तलाश करते हैं, जो उन्हें चुपचाप सुन सके।
तभी, एक दिन मेरी वह पुरानी सखी—मेरी डायरी और मेरी कलम—जिसे मैं जिंदगी की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ आई थी, फिर मेरे पास लौट आई।
इस बार वह सिर्फ मेरे अच्छे-बुरे लम्हों को सहेजने नहीं आई थी।
वह मेरे दुख को बाँटने आई थी।
मेरी अनकही बातों को अपने भीतर समेटने आई थी।
बिना कुछ पूछे, बिना कोई शिकायत किए, मेरी हर बात को अपने भीतर सँभालने आई थी।
और शायद यहीं से मेरी कलम ने फिर मेरा हाथ थाम लिया।
आज बस इतना ही…
मेरी लेखनी के इस आत्ममंथन के सफर में आगे क्या हुआ, मैंने क्या लिखा और कैसे लिखती चली गई—यह कहानी अभी बाकी है।
कल मेरी इस लेखन-यात्रा की अगली कड़ी के साथ फिर मिलिएगा। ❤️
Alpna singh



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