“थोड़ा-बहुत तो मैनेज करना ही पड़ता है"
लघुकथा
“थोड़ा-बहुत तो मैनेज करना ही पड़ता है"
सुनैना और ऋषभ ने पाई-पाई जोड़कर आखिरकार अपना एक घर बना लिया था। शहर से थोड़ा दूर था, लेकिन दोनों बहुत खुश थे। करीब दस साल किराए के मकान में रहने के बाद उन्हें अपने घर का सुख मिला था। अब न मकान मालिक की चिक-चिक थी और न हर महीने के अंत में किराया देने की चिंता। मन में एक अलग ही सुकून था—आखिर यह उनका अपना घर था।
अब घर को जैसे मन करे, वैसे सजाया जा सकता था।
सुनैना और ऋषभ अपने-अपने खयालों में खोए घर को सजाने में लगे हुए थे। फूलों के गमले आने लगे थे। नए पर्दे लग रहे थे। ऑनलाइन कई शो-पीस और सजावटी सामान मंगाए जा रहे थे। दोनों को लगता था जैसे वे सिर्फ घर नहीं, बल्कि अपने सपनों को सजा रहे हों।
बस, एक छोटी-सी कमी थी।
शहर से दूर होने के कारण आसपास अभी ज्यादा आबादी नहीं थी। बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद सुनैना बिल्कुल अकेली हो जाती थी। कभी ऋषभ को ऑफिस के काम से बाहर जाना पड़ता, तो रात के समय भी सुनैना बच्चों के साथ उसी सुनसान इलाके में अकेली रह जाती।
धीरे-धीरे उनके आसपास भी घर बनने लगे। खाली पड़ी जमीन पर मकान खड़े होने लगे और कुछ ही समय में इलाके में चहल-पहल बढ़ने लगी।
लेकिन सच तो यही है कि अच्छे पड़ोसी भी किस्मत से ही मिलते हैं।
सुनैना के घर के ठीक बगल में विमला और रंजीत ने भी अपना घर बना लिया। दोनों उम्र में सुनैना और ऋषभ से छोटे थे। शहर में जमीन महँगी थी, इसलिए उनका मानना था कि एक-एक इंच जमीन का पूरा इस्तेमाल होना चाहिए। इसी सोच में उन्होंने अपनी सीढ़ियाँ सड़क की ओर निकालकर बना लीं।
एक दिन ऋषभ की नजर उस पर पड़ी तो उन्होंने सहजता से कहा, “अरे भाई, आपने सीढ़ियाँ सड़क पर निकाल ली हैं। इससे सड़क कंजेस्टेड हो जाएगी। आने-जाने में परेशानी होगी।”
रंजीत ने कुछ नहीं कहा, लेकिन विमला ने ऋषभ की बात को अपने अपमान की तरह ले लिया।
वह तुरंत बोली, “यह सड़क सबकी है। अगर आपको भी सीढ़ी बनानी है तो आप भी बना लीजिए।”
बात सीढ़ियों से शुरू हुई थी, लेकिन देखते ही देखते तू-तू, मैं-मैं तक पहुँच गई।
कुछ ही देर में आसपास के कई लोग जमा हो गए। सबने एक सुर में ऋषभ को समझाना शुरू कर दिया।
“अरे ऋषभ जी, एक ही जगह रहना है आप सभी को। थोड़ा मैनेज करके चलिए।”
ऋषभ और सुनैना लोगों को नगर पालिका के नियम समझाने लगे।
लेकिन वहाँ नियमों की बात सुनने वाला कौन था?
किसी ने हँसते हुए कहा, “अरे ऋषभ जी, यह कोई मुंबई या कोलकाता थोड़े ही है कि आप इतना रूल बता रहे हैं। छोटा शहर है। शांति से रहिए और दूसरों को भी रहने दीजिए।”
बात आई-गई हो गई।
समय बीतता गया और मोहल्ला बढ़ता गया। एक के बाद एक नए घर बनने लगे। मगर साथ ही हर कोई अपने-अपने तरीके से सड़क का इस्तेमाल करने लगा। किसी ने सीढ़ियाँ सड़क की ओर निकाल लीं, किसी ने छज्जा आगे बढ़ा लिया, तो किसी ने ड्रेनेज का पाइप ही सड़क की ओर निकाल दिया।
शुरुआत में ऋषभ और सुनैना हर किसी को रोकते। नगर पालिका के नियम समझाते। लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय कई लोग तो लड़ाई-झगड़े पर उतर आते।
इन सबमें विमला सबसे आगे रहती। जैसे ऋषभ और सुनैना को नीचा दिखाने में ही उसे एक अलग तरह की संतुष्टि मिलती थी।
एक बार तो ऋषभ ने बाकायदा नगर पालिका में शिकायत कर दी।
नगर पालिका के कर्मचारी मौके पर पहुँचे। लेकिन देखते ही देखते मोहल्ले के लगभग सारे लोग ऋषभ के खिलाफ खड़े हो गए।
ऋषभ को उम्मीद थी कि नगर पालिका के लोग नियमों के अनुसार उनकी बात समझेंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट।
उन्होंने भी ऋषभ को ही समझाना शुरू कर दिया।
“एक जगह घर है आपका, थोड़ा-बहुत तो मैनेज करना ही पड़ेगा। एक ही मोहल्ले में रहकर इस तरह लड़ना अच्छा नहीं लगता। ऋषभ जी, अपनी उम्र का लिहाज कीजिए। आपको इस तरह नहीं लड़ना चाहिए।”
उम्र में छोटे लोगों से ऐसी बातें सुनकर ऋषभ चुप खड़े रह गए।
विमला के चेहरे पर उस समय एक विजयी मुस्कान तैर गई।
सुनैना को यह सब बहुत बुरा लगा। उसी दिन उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब वह ऋषभ को बाहर के लोगों से किसी भी तरह की बहस नहीं करने देगी।
धीरे-धीरे ऋषभ और सुनैना अपने ही घर में सिमटते चले गए।
मोहल्ले में उनकी छवि झगड़ालू और अकड़ू लोगों की बन चुकी थी। लोग उनसे कतराने लगे थे। कोई बात करना भी चाहता तो विमला किसी न किसी तरह उसे रोक देती।
जैसे उसने ऋषभ और सुनैना से अपनी दुश्मनी का एक अलग ही अध्याय खोल रखा था।
देखते-देखते कई साल बीत गए।
मोहल्ला अब पूरी तरह बस चुका था। घरों की संख्या बढ़ गई थी और उसके साथ लोगों की आवाजाही भी।
सड़क पहले से ज्यादा कंजेस्टेड हो चुकी थी। जगह-जगह ड्रेनेज का पानी गिरता था, जिससे सड़क की हालत भी खराब होती जा रही थी। कहीं कोई गाड़ी खड़ी रहती, कहीं किसी ने सामान रख दिया था। हर कोई अपनी सुविधा के हिसाब से सड़क का इस्तेमाल करता था।
मोहल्ले का एक ही मूलमंत्र बन चुका था—
“भाई, एक जगह रहना है तो थोड़ा मैनेज तो करना ही पड़ेगा।”
तुम सड़क का इस्तेमाल करो, मैं भी करूँगा।
तुम अपनी सुविधा देखो, मैं अपनी।
और इस सबके बीच सुनैना और ऋषभ की बात अब किसी को याद भी नहीं थी।
फिर एक दिन अचानक ऐसा हादसा हुआ, जिसने पूरे मोहल्ले को हिलाकर रख दिया।
दोपहर का समय था।
सुनैना रसोई में खाना बना रही थी। तभी उसका बेटा भागता हुआ घर में आया।
“मम्मी, पाइप कहाँ है?”
सुनैना ने पलटकर देखा।
“पाइप? कौन-सा पाइप?”
“अरे माँ, पानी वाला पाइप!”
सुनैना ने जल्दी से कहा, “छत पर है। लेकिन पाइप क्यों चाहिए तुम्हें?”
बेटे ने हाँफते हुए कहा, “विमला आंटी के घर में आग लग गई है!”
इतना कहकर वह पाइप लेने के लिए छत की ओर भागा।
सुनैना भी घबराकर उसके पीछे दौड़ी।
छत पर पहुँचते ही उसने देखा कि सामने विमला के घर से घना काला धुआँ निकल रहा था। कुछ ही पलों में धुएँ के बीच आग की लपटें भी दिखाई देने लगीं।
सुनैना के बेटे ने अपने घर की छत से पाइप लगाकर विमला के घर की ओर पानी की बौछार शुरू कर दी।
सुनैना ने तुरंत फायर ब्रिगेड को फोन किया।
कुछ ही देर में पूरा मोहल्ला विमला के घर के आसपास जमा हो गया। कोई बाल्टी से पानी डाल रहा था, तो कोई अपनी छत से पाइप लगाकर आग बुझाने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन आग की लपटें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं।
घर एक-दूसरे से इतने करीब बने थे कि आग के दूसरे घरों तक पहुँचने का खतरा लगातार बढ़ रहा था।
आखिरकार फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी पहुँच गई, लेकिन सड़क की हालत ऐसी थी कि वह विमला के घर तक पहुँच ही नहीं पा रही थी।
फायर ब्रिगेड के कर्मचारी रास्ता बनाने की कोशिश करते रहे। लोग अपनी गाड़ियाँ हटाने लगे, सामान हटाने लगे, लेकिन रास्ता इतना संकरा था कि गाड़ी को आगे ले जाना मुश्किल हो रहा था।
काफी मशक्कत के बाद किसी तरह आग पर काबू पाया गया और उसे विमला के घर तक ही सीमित रखा जा सका।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
नुकसान काफी हो चुका था।
सबसे बड़ा हादसा विमला के किराएदार के परिवार के साथ हुआ। उनका छोटा बेटा समय रहते घर से बाहर नहीं निकल पाया और आग की चपेट में आ गया। बुरी तरह झुलस जाने के कारण उसकी हालत गंभीर थी।
चंद जानें बच गई थीं, यही उस वक्त सबसे बड़ी राहत थी।
न एंबुलेंस समय पर पहुँच पाई थी और न फायर ब्रिगेड की गाड़ी घर तक पहुँच सकी थी।
सुनैना और ऋषभ अपने घर की छत पर खड़े होकर नम आँखों से विमला के घर की ओर देख रहे थे।
जिस सड़क को लेकर कभी ऋषभ ने नियमों की बात की थी, वही सड़क आज एक परिवार की मदद के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन गई थी।
नीचे विमला का रो-रोकर बुरा हाल था।
और पहली बार शायद पूरे मोहल्ले को समझ आ रहा था कि कुछ नियम सिर्फ नियम नहीं होते—कभी-कभी वे किसी की जिंदगी बचाने का रास्ता भी होते हैं।
सरकारी नियम आम नागरिक की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन अक्सर हम उन्हें अपनी सुविधा में बाधा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हमें लगता है कि थोड़ा-बहुत नियम तोड़ने से क्या फर्क पड़ेगा।
लेकिन असली परेशानी तब समझ आती है, जब किसी हादसे के समय वही छोटी-सी लापरवाही किसी के लिए बड़ी मुश्किल बन जाती है।
ऋषभ की बात उस दिन किसी को समझ नहीं आई थी। सबने यही कहा था—“एक ही जगह रहना है, थोड़ा मैनेज करके चलिए।”
लेकिन जिस सड़क को सबने अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल किया, उसी सड़क ने जरूरत के समय मदद को उनके घर तक पहुँचने नहीं दिया।
कभी-कभी नियम हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि सही समय पर हमारी रक्षा करने के लिए बनाए जाते हैं।
और अफसोस यही है कि आम आदमी को यह बात अक्सर तब समझ आती है, जब बहुत देर हो चुकी होती है।
लेखिका- अल्पना सिंह



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