हाउस वाइफ
हाउस वाइफ
मैं और मेरी बेटी मॉल में कपड़े खरीदने गईं। कपड़े खरीदने के बाद हम काउंटर पर बिल पेमेंट करने आईं। काउंटर पर काफी भीड़ थी, मैं लाइन में खड़ी हो गई। चार काउंटर थे, चारों पर नवजवान लड़के खड़े थे, और चारों काउंटर पर बहुत भीड़ थी। हम लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगे। मेरी बारी आई।
काउंटर पर खड़े लड़के ने प्राइस जोड़कर बोला, "2949 रुपये हुए, मैडम। ऑनलाइन पेमेंट करना है या कैश पेमेंट करना है?"
मैंने कहा, "भाई, तुमने गलत प्राइस जोड़ा है, फिर से जोड़ो।"
काउंटर पर खड़ा लड़का एक बार अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर देखता है और बोलता है, "2949 रुपये हुए, मैडम। ठीक ही बता रहा हूँ मैं।"
मैंने फिर से कहा, "तुमने गलत प्राइस जोड़ा है, फिर से जोड़ो।"
काउंटर पर खड़ा लड़का झुंझलाते हुए बोला, "मैडम, आपको कपड़ा खरीदना है या नहीं? खरीदना है तो पेमेंट कीजिए, और नहीं खरीदना है तो आगे बढ़िए।"
मैंने अपने गुस्से को काबू में रखते हुए शांति से कहा, "खरीदना है भाई, तभी तो यहाँ आई हूँ।" चारों काउंटर पर खड़े लड़के उसे देखने लगते हैं।
उसके बगल वाले काउंटर पर खड़ा लड़का बोला, "अबे, फिर से एक बार देख क्यों नहीं लेता?"
काउंटर पर खड़ा लड़का झुंझलाते हुए मुझसे पूछता है, "ऐसे मैडम, आपके हिसाब से कितना पैसा हुआ बताइए?"
मैंने बड़े ही शांति से जवाब दिया, "मेरे हिसाब से तो 2449 रुपये हुए भाई।"
काउंटर पर खड़ा लड़का बैग के सारे कपड़े पलट देता है और एक-एक कपड़े का फिर से प्राइस मैच करने लगता है। थोड़ी देर में शर्मिंदा होते हुए बोलता है, "सॉरी मैडम, 2449 रुपये हुए। दरअसल, मैंने एक ही शर्ट के प्राइस को दो बार जोड़ दिया था।"
मैं अपने हाथों में ही पैसे लिए हुए थी, उसे देते हुए बोली, "देखो भाई, मैं एक हाउस वाइफ हूँ, घर का सारा बजट लेकर चलना पड़ता है। जो भी खरीदारी करती हूँ, उसका प्राइस पहले जोड़ लेती हूँ।"
उस लड़के ने एक बार फिर से सॉरी बोला, "सॉरी मैडम।"
मैंने कहा, "कोई बात नहीं, भीड़ बहुत है, लेकिन आगे से ध्यान रखना।"
मेरी बेटी बोली, "वाह मम्मी, आपने कमाल कर दिया।"
मैंने कहा, "इसमें कमाल की कोई बात नहीं है बेटे। बहुत से लोग मॉल में जो भी सामान पसंद आती है, बास्केट में रखते जाते हैं, और नीचे काउंटर पर जो भी पैसे बोलता है, दे कर चले जाते हैं। ध्यान नहीं देते और नुकसान उठाना पड़ जाता है। मैं ये नहीं कहती कि वे लोग जानबूझकर ऐसा करते हैं, कभी भीड़ के कारण, कभी ज्यादा कपड़े के कारण। आखिर वे लोग भी इंसान हैं, और गलती भी इंसान से ही होती है। इसलिए हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए।"
— अल्पना सिंह
कहानी का भाव:
ReplyDeleteयह कहानी एक साधारण गृहिणी की सतर्कता और प्रखर बुद्धि को उजागर करती है। कहानी में एक मॉल में खरीदारी करते वक्त एक छोटी सी घटना का वर्णन किया गया है, जहाँ एक गृहिणी ने अपनी सूझबूझ से एक अनजाने में हुई गलती को सही करवा लिया। इसका मूल संदेश यह है कि चाहे कोई भी परिस्थिति हो, हमें सतर्क और सजग रहना चाहिए, खासकर जब पैसे और खरीदारी की बात हो। यह कहानी जीवन में छोटी-छोटी बातों में भी समझदारी और संयम की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
समीक्षा:
कहानी का स्वरूप सरल और प्रभावी है। यह दर्शाती है कि एक गृहिणी, जो आमतौर पर परिवार के बजट और घरेलू जिम्मेदारियों को संभालती है, कैसे छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान देती है और सतर्क रहती है। लेखिका ने मुख्य किरदार के रूप में गृहिणी की मानसिकता को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी शांति और संयम से न केवल एक गलती सही होती है, बल्कि यह भी दिखाया जाता है कि कैसे उसे अपनी जिम्मेदारियों का एहसास है।
कहानी के संवाद सरल और वास्तविक हैं, जिससे पाठक आसानी से जुड़ पाते हैं। बेटी के द्वारा माँ की तारीफ और माँ का उत्तर इस बात को स्पष्ट करता है कि यह सतर्कता हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसा सन्देश देता है, जो सभी को जागरूक करता है कि भीड़, भाग-दौड़ और अव्यवस्था के बीच हमें अपने निर्णयों में सावधानी बरतनी चाहिए।
इस कहानी के माध्यम से यह सिखाया गया है कि छोटी-छोटी बातों में भी हमें जागरूक और सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी गलती का परिणाम बड़ा नुकसान हो सकता है।