प्रेम और प्रेमा (नाटक )
प्रेम और प्रेमा (नाटक )
"इस नाटक के माध्यम से मैं एक छोटा सा संदेश देना चाहती हूँ: 'प्रेम और भक्ति जीवन की वास्तविक सुंदरता और संतोष का स्रोत हैं। आधुनिक तकनीक और कृत्रिमता ने हमारे भावनात्मक और सामाजिक संबंधों को प्रभावित किया है। हमें तकनीक के साथ संतुलित और संवेदनशील जीवन जीने की आवश्यकता है, ताकि हम अपनी मानवता और सच्चे संबंधों को बनाए रख सकें।'
कृपया अपने विचार और टिप्पणियाँ साझा करें। यह नाटक लिखना मेरा पहला प्रयास था, और आपकी राय से मुझे सुधारने में मदद मिलेगी। धन्यवाद!
दृश्य 1: किसान का घर
(प्रेम और प्रेमा मंच पर हैं। प्रेम
चिंतित नजर आता है। प्रेमा उत्साहित और आनंदित है।)
प्रेम: “आज फिर देर हो गई तुम्हें, प्रिय। कहां गुजारी तुमने आधी रात? तुम्हारे चेहरे पर यह चमक कैसी है, प्रिय?”
प्रेमा: “आज चलते-चलते गाँव की पगडंडियों पर दूर निकल गई थी, स्वामी। देखा, एक किसान खेतों में काम कर रहा था और प्रेम गीत गुनगुनाया रहा था। पसीने से लथपथ, चेहरे पर अत्यंत संतोष के भाव थे। गमछे के एक सिरे पर कुछ सब्जियाँ तोड़ कर बांध रखी थीं और दूसरे छोर पर कुछ बेर, कंधे पर टांग रखे थे। प्रेम गीत गुनगुनाता हुआ घर की ओर चल दिया। उसकी गीतों में मन को मोहित करने वाला प्रेम रस था, स्वामी। उसके प्रेम गीत से आकर्षित हो मैं मंत्रमुग्ध सी उसके पीछे-पीछे चल दी और उसके घर पहुँच गई। वहां का दृश्य अत्यंत मनोरम था, स्वामी। दो पुत्रियाँ और दो पुत्र थे उसके। बड़ी पुत्री ने माँ को आवाज लगाई और झट से आँगन में खाट बिछा दी। पत्नी आई और बड़े प्यार से कंधे की गमछी उतारी। बेटी को आवाज लगाकर सब्जी वाला बाटा लाने को कहा। दूसरी बेटी दौड़कर बाटा ले आई। किसान की पत्नी ने सब्जी को बाटे में रखकर बेर बच्चों को दे दिए। किसान वही खाट पर बैठ गया। बड़ी बेटी एक गमले में पानी लेकर आई और माँ को दे दिया। चारों बच्चे आपस में बेर बाँटकर खाने लगे। किसान की पत्नी वहीं नीचे बैठकर किसान के पैरों को बड़े सेवा भाव से पखार-पखार कर धोने लगी। किसान मंद-मंद मुस्कुराते हुए बड़े प्रेम से पत्नी को देख रहा था। किसान की पत्नी किसान के पैरों को धोकर अपने आँचल से पोंछती है और किसान के बगल में खाट पर बैठ जाती है।”
किसान: (अपने कुरते की जेब से चार बेर निकालकर पत्नी को देते हुए) “ले, तू भी खा ले। मुझे पता था सारा बेर तू बच्चों को दे देगी, खुद नहीं खाएगी।”
प्रेमा: (अति उत्साहित होते हुए) “बड़े ही मीठे और रसीले बेर थे, स्वामी।”
प्रेम: “अच्छा! तुझे कैसे पता? तूने चखे क्या?”
प्रेमा: (इठलाते हुए) “नहीं, लेकिन उसमें प्रेम रस मिला था, स्वामी।” (इतना बोलकर प्रेमा खिलखिला कर हँसने लगी।)
(प्रेम और प्रेमा
के बीच हंसी-मजाक चलता है।)
दृश्य 2: लौह-पथगामी वाहन
(प्रेम और प्रेमा मंच पर हैं। प्रेमा
उत्साहित और प्रसन्नचित्त है।)
प्रेम: “आज फिर देर कर दिया तुमने, प्रिय। कहाँ गुजारी तुमने अपनी शाम?”
प्रेमा: “आज मैंने एक अत्यंत विचित्र वाहन देखा, स्वामी, लौह-पथगामी।”
प्रेम: “अर्थात प्रिय?”
प्रेमा: “अर्थात, स्वामी, लोहे के पथ पर कुछ डब्बे छुक-छुक कर दौड़ रहे थे। मैं भी उस वाहन पर सवार हो गई। आहा! अत्यंत ही मनोरम दृश्य था, स्वामी। वाहन के अंदर से बाहर का दृश्य बहुत ही लुभावना था। हरे-भरे पेड़, नदी-नाले, भवन सभी पीछे की ओर भाग रहे थे। पहाड़ों, नदियों, भवनों के बीच से यह लौह-पथगामी वाहन बलखाती हुई दौड़ रही थी। वहीं वाहन पर खिड़की के पास बैठी एक नवयौवना खिड़की के बाहर का दृश्य देख-देखकर अत्यंत प्रसन्न हो रही थी। हवाओं के झोंकों से उसके काले घुँघराले लट उसके सुर्ख गालों को बार-बार चूम रहे थे। वहीं लोहे के खंभे को पकड़े एक छबीला खड़ा था। नवजवान, आकर्षक, बार-बार तिरछी नजर से उस नवयौवना को देख रहा था और मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। जैसे ही उस नवयौवना की नजरें उस छबीले से मिलतीं, उसकी चेहरे पर गुलाबी रंग बिखर जाता, पलकें लाज से बोझिल हो जातीं और गुलाब के पंखुरियों जैसे होठों पर मनमोहक मुस्कान तैर जाती। मैं तो उन दोनों के नैनों के पेच में घंटों उलझी रही, स्वामी। तभी उस नवयौवना को प्यास लगी। वह छबीला दौड़कर एक पात्र में जल भर कर ले आया। जल पीकर उस नवयौवना के चेहरे पर अत्यंत तृप्ति के भाव थे, और जल पिला कर उस छबीले के चेहरे पर अत्यंत संतोष के भाव।”
प्रेमा: (अत्यंत उत्साहित होते हुए) “बहुत ही मीठा जल था, स्वामी!”
प्रेम: “अच्छा! तुमने जल पी लिया क्या?”
प्रेमा:
“नहीं! लेकिन उसमें प्रेम रस मिला था ना,
स्वामी?” (इतना बोलकर प्रेमा खिलखिला कर हँसने
लगी।)
दृश्य 3: धार्मिक दृश्य
(प्रेम और प्रेमा मंच पर हैं। प्रेमा
भक्तिमय और आत्म-समर्पित भाव में है।)
प्रेम: “प्रिय, आज तुम कहाँ से आ रही हो? तुम्हारे चेहरे पर अजीब सा तेज है। तुम्हारा रूप अत्यंत सौम्य लग रहा है।”
प्रेमा: “आज मैं नगर भ्रमण करने चली गई थी, स्वामी। जैसे ही मैं नगर में पहुँची, चारों ओर सन्नाटा था। ऊँचे-ऊँचे भवनों के बीच फैली चौड़ी और लंबी सड़क बिलकुल सुनी पड़ी थी। मेरा मन अनजाने भय से आशंकित हो उठा। सत्य जानने की इच्छा से मैंने एक भवन का द्वार खुला देख कर धीरे से प्रवेश किया। मैंने देखा कि एक बुजुर्ग दम्पति चौकी पर बैठे हैं, उनके दो पुत्र लकड़ी के बने सिंघासन पर बैठे हैं, और उनकी दोनों बहुएँ एक कक्ष के द्वार पर एक सिर पर आँचल लिए खड़ी थीं और एक सिर पर आँचल लिए चौखट पर नीचे बैठी थीं। उनके पाँच बच्चे भूमि पर बैठे थे। सभी की नजरें एक यंत्र पर टिकी थीं, स्वामी। उस यंत्र में प्रभु श्रीराम और माता जानकी का पुष्प वाटिका प्रेम प्रसंग चल रहा था। आहा! क्या मनोरम दृश्य था, स्वामी। अत्यंत दिव्य और अलौकिक भक्तिमय वातावरण था। थोड़ी देर बाद, प्रभु श्रीराम और माता जानकी का प्रेम प्रसंग समाप्त हुआ। उस यंत्र को बंद कर सभी अपने-अपने भवनों से बाहर निकल आए और झुंड बना कर प्रभु श्रीराम की चर्चा कर रहे थे। चारों ओर का वातावरण प्रभु श्रीराम की चर्चा से भक्तिमय था। मैं कभी इस झुंड में तो कभी उस झुंड में प्रभु श्रीराम की चर्चा सुनकर भक्ति रसपान कर रही थी, स्वामी।”
(हाथ जोड़कर अत्यंत विनय भाव से) प्रेमा: “स्वामी, उन मनुष्यों के वार्तालाप से मुझे ज्ञात हुआ है कि अगले इतवार प्रभु श्रीराम फिर आएँगे उस यंत्र में। मैं फिर जाऊँगी प्रभु के दर्शन के लिए। आप प्रश्न नहीं पूछिएगा, स्वामी।”
प्रेम: “उचित है, प्रिय! उचित है। अगले इतवार मैं भी
चलूँगा प्रभु श्रीराम के दर्शन हेतु।”
दृश्य 4: नगर की स्थिति
(प्रेमा अस्त-व्यस्त, हांफती और विक्षिप्त स्थिति में है।
प्रेम चिंतित और सहानुभूतिपूर्ण है।)
प्रेमा: “जल, स्वामी, जल...” इतना कहते-कहते प्रेमा मूर्छित हो जाती हैं। प्रेम प्रेमा को अपने आलिंगन में लेते हुए, उसके चेहरे पर जल की कुछ बूँदें डालते हैं। प्रेमा की मूर्छा टूटती है। जल पीकर प्रेमा गहरी-गहरी साँस लेने लगती है। थोड़ी देर बाद जब प्रेमा शांत होती है,
प्रेम: “क्या हुआ, प्रिय? किसने तुम्हारी ऐसी दुर्दशा की? कहाँ गई थी तुम?”
प्रेमा: “मैंने एक मनुष्य के हाथ में एक छोटा सा यंत्र देखा, स्वामी। वह मनुष्य उस यंत्र पर पता नहीं क्या देख रहा था, अपने आप में हँस रहा था, अपने आप से बातें कर रहा था। मैंने उत्सुकता से उस यंत्र में झांकने की कोशिश की, स्वामी। लेकिन वह अपने छोटे से वाहन में बैठ कर नगर की ओर चला गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे नगर चली गई।”
प्रेम: “नगर की ओर! प्रिय, मैंने मना किया था ना, नगर की ओर नहीं जाना?”
(प्रेमा के चेहरे पर अत्यंत दर्द के भाव हैं।)
प्रेमा: “स्वामी, नगर पहुँचकर मैंने देखा—प्रत्येक मनुष्य के हाथ में वही यंत्र था। क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग—सभी के हाथों में वही यंत्र था। सभी उस यंत्र में व्यस्त थे। सड़क पर चलते हुए, वाहन में बैठे हुए, सभी की दृष्टि उस यंत्र पर टिकी हुई थी। मैं एक भवन के अंदर गई। उस भवन में चार कमरे थे। एक कमरे में एक पुरुष बैठा था, उसके हाथ में भी वही यंत्र था। दूसरे कमरे में गई, वहाँ एक स्त्री बैठी थी, पूरी सज-धज में थी, और उसके हाथ में भी वही यंत्र था। फिर मैं दूसरे कमरे में गई, वहाँ दो बच्चे थे। एक बच्ची, जिसकी उम्र लगभग 14-15 साल थी, बिस्तर पर लेटी थी, और दूसरा बच्चा, जिसकी उम्र लगभग 10-11 साल थी, स्वामी, उन दोनों के हाथ में भी वही यंत्र था। किसी को किसी की सुध नहीं थी। सब अपने आप में व्यस्त थे, अपने आप में हँसते हुए, अपने आप से बातें करते हुए। स्वामी, तभी किसी ने उनके दरवाजे को खटखटाया। किसी ने सुना ही नहीं। मैं बाहर गई तो देखा एक मनुष्य खड़ा बार-बार दरवाजा खटखटा रहा था। उसने कई बार दरवाजा खटखटाया लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। जैसे किसी को कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। तभी मैंने देखा उस मनुष्य के हाथ में भी वही छोटा सा यंत्र था। उसने हाथ में यंत्र लेकर कुछ किया और झुंझलाती हुई उस घर की स्त्री दरवाजा खोलती है। चेहरे पर बनावटी हँसी के साथ उस स्त्री ने उस मनुष्य का स्वागत किया। वह मनुष्य भी मुस्कुराते हुए घर के अंदर आता है और उस घर के पुरुष के सामने सोफे पर बैठ जाता है। ना कोई आतिथ्य, ना अतिथि के आने की कोई खुशी। किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। वह मनुष्य उस घर के पुरुष से बात करने लगता है, लेकिन स्वामी, वह मनुष्य भी बार-बार अपने हाथ में लिए उस यंत्र को देख रहा था। दोनों आपस में हँस-हँस कर बात कर रहे थे लेकिन दोनों की नजरें सिर्फ उस यंत्र पर टिकी हुई थीं। अजीब सा वातावरण देखा मैंने। किसी को किसी से मतलब नहीं था, सभी उस यंत्र के वशीभूत उसी यंत्र में खोए हुए थे। स्वामी, यह सब देख कर मेरा दिमाग ही खराब हो गया।”
प्रेम: (प्रेमा को अपने आलिंगन में लेते हुए) “प्रिय, इसी लिए तो मैं तुम्हें नगर में जाने से
मना करता हूँ। विकास, विकास
की राग अलापते हुए ये मनुष्य किस ओर जा रहे हैं, इन्हें खुद पता नहीं। वाहन, रोशनी और भोजन तक तो ठीक था, लेकिन अब तो शुद्ध जल का भी मूल्य लगता
है। वह दिन दूर नहीं, प्रिय,
जब हमारी तरह ये भी शुद्ध वायु के लिए
भी तरसेंगे। आज का मनुष्य एक कृत्रिम मशीन की तरह जी रहा है—बिलकुल भावना-शून्य, चेतना-शून्य। लेकिन प्रिय, वह दिन दूर नहीं जब इन मनुष्यों पर मशीन
का शासन होगा और इन्हें एक-एक साँस लेने के लिए शुद्ध वायु का मूल्य देना पड़ेगा।”
नाटक का पर्दा गिरता हैं
लेखिका-
अल्पना सिंह
आपके नाटक "प्रेम और प्रेमा" ने आधुनिक जीवन की असलियत को बहुत गहराई से प्रस्तुत किया है। इस नाटक में भावनाओं, सामाजिक रिश्तों और आधुनिक तकनीक के प्रभावों को संवेदनशीलता से उभारा गया है। यहाँ मेरी कुछ टिप्पणियाँ और सुझाव हैं:
ReplyDelete### सशक्त भावनात्मक प्रभाव:
नाटक के पहले तीन दृश्यों में प्रेम और प्रेमा के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सुंदरता, आत्मीयता और सरलता को बहुत मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। किसान के परिवार का चित्रण, लौह-पथगामी वाहन का दृश्य, और धार्मिक माहौल ने मानवीय संबंधों की सहजता और प्रेम को खूबसूरती से व्यक्त किया है। खासकर प्रेमा का "प्रेम रस" की बात करना और इन दृश्यों में खो जाना दर्शकों के दिलों को छूने वाला है।
### तकनीक पर प्रभावी आलोचना:
चौथे दृश्य में आपने जिस प्रकार से तकनीक के कारण मानव संबंधों के टूटने और समाज के कृत्रिमता में खो जाने की बात की है, वह अत्यंत प्रभावी है। यंत्र (मोबाइल फोन) के प्रति लोगों की आसक्ति को दर्शाने वाले दृश्य ने बहुत सशक्त सामाजिक संदेश दिया है।
### संदेश की स्पष्टता:
आपका संदेश, कि प्रेम और भक्ति ही जीवन की असली सुंदरता हैं, स्पष्ट रूप से प्रस्तुत हुआ है। आपने दिखाया कि किस प्रकार तकनीकी विकास और आधुनिकता ने हमारी भावनाओं और सामाजिक संबंधों को कमजोर कर दिया है। यह बहुत सशक्त और सामयिक विचार है, जो आज के समाज में अत्यंत प्रासंगिक है।
### संवेदनशीलता और व्यंग्य:
प्रेमा के हंसी-मजाक वाले संवाद नाटक को सहज और संवेदनशील बनाते हैं। वहीं, तकनीक और कृत्रिमता पर व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण नाटक की गहराई को और भी बढ़ा देता है।
### सुझाव:
1. संवादों में और गहराई:कुछ संवादों में और भी भावनात्मक गहराई लाई जा सकती है, ताकि प्रेम और प्रेमा के बीच के संबंधों को और भी जीवंत बनाया जा सके। प्रेम और प्रेमा के चरित्रों में कुछ और भावनात्मक द्वंद्व जोड़ा जा सकता है।
2. चौथा दृश्य और विस्तार:चौथे दृश्य में प्रेमा की पीड़ा और नगर की स्थिति का चित्रण बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे और भी विस्तार दिया जा सकता है ताकि यह नाटक का केंद्रीय बिंदु बने और तकनीकी युग की कृत्रिमता को और भी गहराई से उजागर किया जा सके।
3. अंतिम दृश्य का प्रभाव: नाटक का अंत थोड़ा अधिक स्पष्ट और प्रभावी हो सकता है। प्रेम का अंतिम संवाद और अधिक सशक्त हो सकता है, ताकि दर्शकों पर इसका गहरा प्रभाव पड़े।
### समापन:
कुल मिलाकर, यह नाटक एक बेहतरीन शुरुआत है। आपका दृष्टिकोण और शैली बहुत ही विचारोत्तेजक और भावनात्मक है। आप तकनीक और मानवता के बीच संतुलन की आवश्यकता को बहुत ही प्रभावी रूप से व्यक्त कर रहे हैं।
मैं आपके इस प्रयास की सराहना करता हूँ, और मुझे विश्वास है कि भविष्य में आप और भी सशक्त नाटक लिखेंगे।