सुमी का "पिया बसंती" (भाग-2)
सुमी का "पिया बसंती" (भाग-2)
दूसरे दिन सुबह
मैं जल्दी उठ गई। जल्दी-जल्दी तैयार होकर एग्जामिनेशन हॉल की ओर चल दी। दिल में एक
बेचैनी थी, ना जाने क्यों मेरा दिल जोर से धड़क रहा
था। कई सवाल मेरे दिमाग में घूम रहे थे—क्या वो आज फिर मुझे मिलेगा? क्या आज फिर से वो
मुझे तिरछी नजर से देखेगा? पता नहीं क्यों मेरा दिल ऐसी बातें सोच रहा
था, और सोच-सोचकर परेशान हो रहा था। एक हलचल
मची थी दिल के अंदर। आज मैं जल्दी एग्जामिनेशन ग्राउंड में पहुँच गई थी। एग्जाम
शुरू होने में अभी 20 मिनट बाकी थे।
मैं ग्राउंड में
पहुँचकर इधर-उधर चारों तरफ देखने लगी। मेरी नज़रें उसे ही ढूंढ रही थीं, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दिया।
जैसे-जैसे समय बीत रहा था, वैसे-वैसे मेरे दिल की धड़कनें तेज हो
रही थीं। मैं मन ही मन सोच रही थी, "वह अभी तक क्यों नहीं आया है?"
इतने में मेरी
सहेली मितु आई और बोली, "चल सुमी, एग्जाम शुरू होने वाला है, अब चलते हैं।" मैं अनमने ढंग से धीरे-धीरे चलती हुई
अपनी सीट पर जाकर बैठ गई। मैंने जैसे-तैसे अपना पेपर पूरा किया, लेकिन मेरा मन अभी भी उसी के आसपास घूम
रहा था।
एग्जाम खत्म हुआ
और मैं हॉल से बाहर निकली। बाहर आकर मैं अपनी सहेलियों के साथ पेपर डिस्कस कर रही
थी कि तभी मेरी सहेली मितु ने आकर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "देख सुमी, तेरा 'पिया बसंती' आ गया, जिसे तू सुबह से ढूंढ रही थी!"
मितु की बात सुनकर
मैं झेप गई, मेरे गाल फिर से लाल हो गए। वहाँ खड़ी
मेरी सारी सहेलियाँ खिलखिला कर हंस पड़ीं। मुझे मितु पर बहुत गुस्सा आया। मैंने
धीरे से एक नज़र उठाकर उस लड़के की ओर देखा और फिर अपनी सहेली मितु को झिड़कते हुए
बोली, "चुप कर! मैं इसे थोड़ी ढूंढ रही थी। तू ये
क्या बोली? मेरा पिया बसंती, मेरा नहीं, तेरा पिया बसंती
होगा।" मेरी बात सुनकर एक बार फिर मेरी सारी सहेलियाँ खिलखिला कर हंस पड़ीं।
इसके बाद तो ये सिलसिला बन गया, मितु ने उसका नाम
ही रख दिया 'पिया बसंती'।
फिर क्या था, यह 'पिया बसंती' हम सहेलियों के लिए एक सब्जेक्ट बन गया।
एग्जाम देने आते वक्त 'पिया बसंती' का नाम, एग्जाम देकर घर लौटते वक्त 'पिया बसंती' का नाम। जब तक एग्जाम चलता रहा, 'पिया बसंती' हमलोगों के बीच घूमता रहा। पांच दिनों तक
एग्जाम चला। उसका मेरी ओर तिरछी नजरों से देखना बदस्तूर जारी रहा, और ना चाहते हुए भी मैं भी सबकी नजरो से नजर
बचाकर एक नजर उसकी ओर देख लेती थी।
जब भी मेरी नजरें
उसकी नजरों से मिलतीं, मैं शर्म से अपनी नजरें झुका लेती थी।
पांच दिन बाद एग्जाम खत्म हुए, और मैं अपने घर
वापस आ गई, लेकिन अपना दिल वहीं, उस सांवली सलोनी सूरत के पास छोड़ आई।
गाँव आने के बाद
मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। मेरी सहेली मितु का छेड़ना भी जारी रहा। एक दिन ऐसा
नहीं बिता जब मेरी सहेलियों ने 'पिया बसंती' का नाम लेकर मुझे चिढ़ाया न हो, और एक शाम ऐसी नहीं गुजरी जब 'पिया बसंती' को मैंने याद नहीं किया हो।
पहले-पहल तो मैं
चिढ़ जाती थी, मितु जब भी मुझे 'पिया बसंती' का नाम लेकर चिढ़ाती थी, लेकिन धीरे-धीरे मुझे भी 'पिया बसंती' सुनने की आदत पड़ गई। सहेलियों को थोड़ी
डांट लगा देती तो वे लोग डर से चुप हो जातीं, लेकिन मितु, मितु तो मेरी सर चढ़ी सहेली थी। उसने 'पिया बसंती' की नकल उतार-उतार कर खुद भी हंसती थी और मेरी सहेलियों को
भी हंसाती थी।
इस तरह 'पिया बसंती' मेरे जीवन के हर पल में शामिल हो गया। सहेलियों की
हंसी-ठिठोलियों में, होली के रंगों में, गाँव की पगडंडियों पर, खेत-खलिहान में, कभी भीड़ में तो कभी अकेले तन्हाइयों
में। जाने-अनजाने 'पिया बसंती' मेरे जीवन के हर रंग में शामिल हो गया था, और मैंने भी उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।
अभी मैं 'पिया बसंती' के नाम से चिढ़ती नहीं थी। शायद बढ़ती उम्र के साथ मैं
परिपक्व हो रही थी। लेकिन उस वक्त मुझे नहीं पता था कि इन्हीं मजाक-मजाक में मेरी
जिंदगी 'पिया बसंती' के नाम हो जाएगी। उस एग्जाम के बाद मेरी
उससे कभी मुलाकात नहीं हुई, न ही मैंने उसे कभी देखा। लेकिन वह एक
मीठी याद बनकर मेरे दिल में बस गया था।
मैं ना तो उसका
असली नाम जानती थी और न ही उसका पता। और ये सब जानने की कभी कोई इच्छा भी नहीं हुई, क्योंकि ये सब एक मजाक था। फिर भी दिल के
किसी कोने में एक इच्छा होती थी कि मैं एक बार 'पिया बसंती' से मिलूं, उससे बात करूं। जानती थी कि ये नामुमकिन है, लेकिन फिर भी दिल तो दिल होता है। 'पिया बसंती' मेरे जीवन में एक यादगार पल बनकर रह गया था।
क्या सुमी की
मुलाकात होगी 'पिया बसंती' से या ये 'पिया बसंती' केवल एक मीठी याद बनकर रह जाएगा उसकी
जिंदगी में? जानने के लिए पढ़ें 'पिया बसंती' का अगला भाग।
लेखिका-अल्पना सिंह
nice story
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