पिया बसंती (भाग-3)
पिया बसंती (भाग-3)
समय ने पंख लगा लिए थे, और मैं अपनी दुनिया में खोई हुई थी। पांच सालों का एक लंबा समय बीत चुका था। अब मैं बी.ए. फाइनल इयर में थी। मेरी सहेलियों की शादी हो चुकी थी, और मेरे पापा भी मेरे लिए रिश्ता ढूंढ रहे थे। मितु, मेरी सबसे करीबी सहेली, मुझे कभी भी "पिया बसंती" का नाम लेकर छेड़ने से नहीं चूकती थी। मैं बस हंसकर टाल देती थी, लेकिन मेरे दिल के भीतर कुछ और ही चल रहा था।
जैसे ऊपर वाला भी मेरी इच्छा पूरी करना चाहता था, ठीक उसी समय एक घटना घटी। मेरी बुआ की तबियत अचानक से बहुत खराब हो गई। उनके बेटे-बहू दूसरे शहर में रहते थे। बुआ के बेटे को ऑफिस में छुट्टी नहीं मिल पाने के कारण वे लोग ज्यादा दिनों तक बुआ के घर नहीं रुक पाए। बुआ के बेटे की इच्छा थी कि वे बुआ को अपने साथ ले जाएं, लेकिन मेरी बुआ कहीं नहीं जाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने मेरे पापा, यानी अपने भाई को फोन किया, और मुझे अपने पास बुलाया। फिर मुझे बुआ की सेवा करने के लिए बुआ के घर जाना पड़ा, और इस तरह मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया।
पूरे पांच साल बाद मैं अपने बुआ के घर आई थी। मैंने देखा, बुआ के घर में बहुत कुछ बदल गया था। बुआ के घर के आस-पास कुछ नए घर भी बन गए थे, जिनमें नए लोग रहने आए थे। बुआ के घर बुआ का हालचाल पूछने के लिए कई लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। मैं बुआ की देखभाल के साथ-साथ घर में आने वाले मेहमानों के लिए चाय-नाश्ता बनाने में लगी रहती थी।
एक सुबह, जब मैं बुआ को दवा खिला रही थी और किचन में काम कर रही थी, फूफा जी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, “सुमी बेटा, दो कप चाय बनाना।” फूफा जी की आवाज सुनकर मैं मन ही मन सोचने लगी, शायद फिर कोई आया होगा बुआ जी की तबियत पूछने। मैंने किचन से ही जोर से कहा, “अभी लाती हूँ, फूफा जी।”
फिर थोड़ी देर बाद, मैं दो कप चाय लेकर गेस्ट रूम में पहुंची। वहां मैंने देखा, गेस्ट रूम में एक 20-22 साल का हैंडसम लड़का सोफे पर बैठा फूफा जी से बातें कर रहा था। मैं थोड़ी देर के लिए दरवाजे पर ठिठक गई। तभी मेरे फूफा जी ने टेबल की ओर इशारा करते हुए हंसकर कहा, “रख दो, बेटा।” फूफा जी की बात सुनकर मैं कमरे के अंदर गई और एक नजर उस लड़के की ओर देखा। वो लड़का मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। मैंने चाय को धीरे से टेबल पर रख दिया और चुपचाप वापस चली आई। लेकिन मुझे वो लड़का और उसकी मुस्कान जानी-पहचानी सी लगी। किचन में खड़े होकर मैं सोचने लगी, ये चेहरा कुछ जाना-पहचाना लग रहा है—ये आंखें, ये मुस्कान... कहां देखा है मैंने इसे? लेकिन मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा। कुछ देर में मुझे याद आ गया, और मैंने मन ही मन कहा, “अरे, ये तो पिया बसंती है!”
पिया बसंती याद आते ही मेरे दिल में एक अजीब सी खुशी महसूस हुई। मैंने मन ही मन सोचा, कितना बदल गया है। पहले कितना दुबला-पतला, बाल बिखरे हुए, शरारती आंखें... और आज कितना हैंडसम हो गया है! कपड़े भी ढंग से पहने हैं, बाल भी संवार रखे हैं। और आवाज, आवाज भी थोड़ी भारी हो गई है। बस मुस्कान, मुस्कान नहीं बदली है—अभी भी वही प्यारी मुस्कान है। पिया बसंती को देखकर सुमी के दिल में एक हलचल सी मच गई थी।
पिया बसंती को देखकर सुमी एकदम से मचल उठी अपनी सहेली मितु से बात करने के लिए। सुमी बेसब्री से इंतज़ार करने लगी अपने फूफा जी के ऑफिस जाने का, क्योंकि उसी कमरे में फोन था। अभी सुमी किचन के खिड़की पास खड़ी ये सारी बातें सोच ही रही थी कि उसकी नजर पिया बसंती पर पड़ी। शायद पिया बसंती अपने घर जा रहा था। सुमी खिड़की से बाहर पिया बसंती को देख रही थी कि पिया बसंती भी एक नजर उठा कर खिड़की की ओर देखता है, और सुमी की नज़र पिया बसंती से टकरा जाती है। जैसे ही सुमी की नजर पिया बसंती से मिलती है, सुमी घबरा कर खिड़की की ओर पीठ कर अपना मुंह पीछे की ओर मोड़ लेती है, और पिया बसंती एक बार फिर मुस्कुरा कर अपने सर को हिलाते हुए वहां से चला जाता है। पिया बसंती का अपनी ओर तिरछी नजर से देख कर यूं मुस्कुराते देख सुमी का चेहरा शरम से लाल हो जाता है—“हाय दईया, अभी भी तिरछी नजर से देख कर मुस्कुराना बंद नहीं किया इसने।”
क्या मोड़ लेने वाली है सुमी की जिंदगी? क्या होगा जब सुमी का सामना होगा अपने पिया बसंती से? जानने के लिए मेरे साथ बने रहिए और पढ़ते रहिए मेरी कहानी "सुमी का पिया बसंती"।
लेखिका - अल्पना सिंह
very nice story
ReplyDelete"पिया बसंती" (भाग-3) सुमी के जीवन में आए एक अनोखे मोड़ को दर्शाती है, जिसमें बीते वर्षों के बाद उसकी मुलाकात उसके बचपन के प्यार, पिया बसंती, से होती है। पांच साल बाद, सुमी अपनी बीमार बुआ की सेवा करने के लिए उनके घर जाती है, जहाँ उसे एक अप्रत्याशित संयोग से पिया बसंती फिर से मिलता है। पहले की शरारती, दुबले-पतले पिया बसंती के बदले एक हैंडसम और आकर्षक युवक देखकर सुमी का दिल हलचल से भर उठता है।
ReplyDeleteयह कहानी सुमी की बचपन की यादों और उसके वर्तमान भावनात्मक संघर्ष को खूबसूरती से चित्रित करती है। पिया बसंती की एक झलक और उसकी तिरछी मुस्कान सुमी को पुराने दिनों की याद दिला देती है, और उसके भीतर एक नई उम्मीद और हल्की सी शर्मिंदगी भी जाग उठती है। कहानी के इस मोड़ पर एक रोमांचक सवाल खड़ा होता है: क्या पिया बसंती भी सुमी को उसी तरह महसूस करता है? क्या उनके बीच का यह संबंध आगे बढ़ेगा?
कहानी के पात्रों की सरलता और उनकी भावनाओं का खूबसूरत चित्रण इसे पाठकों के लिए दिलचस्प और रोमांटिक बनाता है।