पिया बसंती-(भाग-4)
पिया बसंती-(भाग-4)
उस दिन जैसे ही
फूफा जी ऑफिस के लिए निकले, मैंने झट से अपनी सहेली मितु को फोन
मिलाया। मितु मेरी सबसे अच्छी सहेली के साथ-साथ हमराज भी थी इस पिया बसंती की।
फोन पर: मितु- “हेल्लो, कौन?”
सुमी— “हेल्लो मितु, मैं हूँ सुमी।”
मितु चौकते हुए- “सुमी? कहाँ हैं तू, और ये कहाँ से फोन कर रही है?”
सुमी- “बुआ के घर आई हूँ, बुआ की तबियत ठीक नहीं है इसलिए।”
मितु अफसोस जाहिर
करते हुए- “ओह..., अभी कैसी तबियत है बुआ जी की?”
सुमी- “बुआ जी की तबियत अब ठीक है, लेकिन मितु, मुझे तुझसे एक बात बतानी थी।”
मितु- “कौन सी बात बतानी है, बोल?”
सुमी- “मितु, पिया बसंती याद है
तुझे?”
पिया बसंती का नाम
सुनते ही मितु एकदम से खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली- “अरे, पिया बसंती को कैसे भूल सकती हूँ भला, तेरा पिया बसंती, मेरा मतलब है सुमी का पिया बसंती,” कहकर मितु फिर से हंसने लगी।
सुमी थोड़ा नाराज
होते हुए- “चल हट, मेरा पिया बसंती क्यों? तू मुझे ऐसे छेड़ेगी तो मैं तुझे कुछ नहीं बताने वाली।”
मितु सुमी को
मनाते हुए- “सॉरी, सॉरी यार, अब नहीं बोलूंगी, चल बता, क्या बताने वाली है पिया बसंती के बारे में?”
सुमी धीरे से- “मितु, पिया बसंती भी आया
हुआ है इधर।”
सुमी की बात सुनकर
मितु चौंकते हुए- “अच्छा, तूने देखा क्या उसे?”
सुमी- “देखा तभी तो बता रही हूँ तुझे।”
मितु एक्साइटेड
होते हुए- “अच्छा, पिया बसंती कैसा दिखता है अभी? पहले जैसा है या बदल गया है?”
सुमी- “एकदम बदल गया है, बहुत हैंडसम, स्मार्ट हो गया है। तू देखेगी तो पहचान ही नहीं पाएगी।”
मितु फिर से सुमी
को छेड़ते हुए- “अच्छा? तूने पहचान लिया ना, मुझे पहचानने की क्या जरूरत?”
सुमी थोड़ा चिढ़ते
हुए- “तू फिर मुझे छेड़ने लगी, चल, मैं अब फोन रखती हूँ।”
मितु सुमी को
मनाते हुए- “अरे, नहीं, फोन नहीं रखना
सुमी! चल, अब से नहीं बोलूंगी। चल, बता कुछ बात हुई उससे? उसने तुझे पहचाना या नहीं?”
सुमी खीजते हुए- “मैं क्यों बात करूँगी उससे भला, और मुझे कैसे पता चलेगा कि उसने मुझे
पहचाना या नहीं। सुमी शरारती आवाज में- “लेकिन उसके देखने का स्टाइल वही पुराना वाला है, चोरी-चोरी।”
इतना बोलकर सुमी
भी खिलखिला कर हंसने लगी, दूसरी तरफ से मितु भी खिलखिला कर हंस रही
थी।
इसी तरह हम दोनों
सहेलियों में घंटों बातें होती रहीं, पिया बसंती की हर अदा, हर स्टाइल को याद कर घंटों हंसती रहीं हम दोनों सहेलियाँ।
मितु से बातें
करते-करते कब दोपहर के 2 बज गए, मुझे पता भी नहीं चला। तभी बुआ जी की आवाज कानों में सुनाई
पड़ी- “सुमी, देख दरवाजे पर कोई आया है।”
बुआ की आवाज सुनकर
मैं झट से फोन रखते हुए मितु से बोली- “मितु, लगता है कोई आया। मैं बाद में फोन
करूँगी।” इतना बोलकर मैंने फोन रखा और दरवाजे की
ओर भागी। दरवाजे को खोला तो सामने पिया बसंती खड़ा था। पिया बसंती को सामने देखकर
मैं एकदम से शॉक्ड हो जाती हूँ। थोड़ी देर के लिए मैं अपलक केवल पिया बसंती को
देखती रह जाती हूँ। वह ठीक मेरे सामने खड़ा था, और मैं बिलकुल स्तब्ध उसके सामने खड़ी, मुंह से कोई बोल ही नहीं निकल रहा था। वह
भी कुछ नहीं बोल रहा था, वह भी बस मेरी ओर एकटक देख रहा था।
अभी मैं स्तब्ध
खड़ी ही थी कि बुआ जी की आवाज सुनाई पड़ी- “कौन है सुमी?”
बुआ के सवाल का
मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं क्या बोलूँ, ये सोच ही रही थी कि पिया बसंती बोल पड़ा- “मैं हूँ आंटी, रवि।”
बुआ की आवाज सुनाई
पड़ी- “रवि, आ जाओ बेटा, अंदर आ जाओ।”
बुआ की बात सुनकर
मैं कुछ नहीं बोली, बस धीरे से दरवाजे से अलग हट गई, और वह मुस्कुराते हुए अंदर बुआ के कमरे
में चला गया। मैं थोड़ी देर वही दरवाजे पर खड़ी उसे अंदर जाते हुए देखती रही, और मन ही मन सोच रही थी कि- “ओ तो पिया बसंती का असली नाम रवि।”
अभी मैं दरवाजे पर
ही खड़ी थी कि बुआ जी की आवाज फिर से मुझे सुनाई पड़ी- “सुमी।”
मैं भागकर बुआ के
कमरे में पहुँची- “जी बुआ जी।”
बुआ जी- “बेटा, एक कप चाय बनाना
जरा।”
मैं जी बोलने ही
वाली थी कि इससे पहले पिया बसंती बोल पड़ा- “नहीं, नहीं आंटी, चाय बनाने की कोई जरूरत नहीं, मैं अभी-अभी खाना खाकर आया हूँ।”
पिया बसंती की बात
सुनकर बुआ एक गहरी सांस लेते हुए- “ठीक है बेटे, जैसी तेरी इच्छा।”
थोड़ी देर चुप
रहने के बाद पिया बसंती बोला- “आपने मुझे बुलाया
था आंटी, आपको कोई काम था? बोलिए, क्या काम था आपको?”
बुआ जी बोली- “हां बेटे, ये मेरी भतीजी
सुमी है। अगर तुम्हें एतराज न हो तो तुम इसे सारा शहर घुमा दोगे? ऐसे अभी के गए ये कब आएगी, पता नहीं। मैं तो बीमार हूँ और इसके फूफा
जी को काम से ही फुर्सत नहीं मिलती।”
पिया बसंती, सॉरी, अब मुझे उसका नाम पता चल गया था रवि, हंसते हुए बोला- “इसमें परेशानी वाली क्या बात है, आंटी? आप जब बोलिएगा, तब घुमा दूंगा।”
पिया बसंती का
वापस मेरी जिंदगी में आना, जैसे मेरे सतरंगी सपनों का मेरी जिंदगी
में वापस आना था। दिल को जैसे पंख मिल गए, खुले आसमान में उड़ने के लिए। चारों ओर जैसे बसंत की बहार आ
गई हो और यह दिल पंख लगा कर कभी इस डाली, कभी उस डाली बैठकर मीठे सपने बुनने लगा। हर सुबह नई और हर
शाम सुहानी लगने लगी। रातें जाग कर और दिन सपनों में गुजारने लगा। बुआ जी का यह
कहना, “बेटा रवि, ये मेरी भतीजी सुमी हैं। कुछ दिनों में ये गाँव चली जाएगी, तू ऐसा कर, इसे सारा शहर घुमा दे,” जैसे मेरे लिए एक सरप्राइज गिफ्ट था।
सुमी पिया बसंती
से हुआ आमना-सामना, क्या मोड़ लेने वाली हैं सुमी की जिंदगी, क्या बसंती प्यार के
रंग में रंगेगी सुमी की जिंदगी ? आगे की कहानी अगले भाग में,
कहानी का यह भाग सुमी और उसके पुराने साथी, जिसे वह प्यार से "पिया बसंती" कहती है, के अचानक पुनर्मिलन को चित्रित करता है। सुमी, अपनी अंतरंग सहेली मितु के साथ इस पुराने और शायद अधूरे प्रेम की यादें साझा करती है। मितु के साथ उसकी बातचीत में उस मासूमियत और छेड़छाड़ भरी दोस्ती की मिठास झलकती है, जो पुराने दोस्तों के बीच अक्सर देखी जाती है।
ReplyDeleteरवि के सामने अचानक आ जाने से सुमी की भावनाओं में एक नया उत्थान देखने को मिलता है। इस मुलाकात में, वह एक पल के लिए स्तब्ध रह जाती है, और इसी क्षण का विस्तार कहानी में एक नए अध्याय की ओर संकेत करता है। सुमी के दिल में पुराने सपने और उम्मीदें फिर से जीवित हो जाती हैं, और उसका मन एक बार फिर प्रेम की उस मिठास और उल्लास से भर जाता है, जिसे शायद उसने भुला दिया था।
इसमें सुमी के मनोभावों और उसकी उमंग को सहजता से अभिव्यक्त किया है, जिससे पाठक खुद को सुमी के साथ उस भावनात्मक यात्रा पर महसूस करने लगते हैं। कहानी की भाषा सरल और सहज है, परंतु इसमें भावनाओं की गहराई और खूबसूरती से बुनाई की गई है। इस भाग का अंत पाठक को अगले भाग के लिए उत्सुक बनाता है, और सवाल छोड़ जाता है कि क्या सुमी का यह सतरंगी सपना हकीकत में बदलेगा।
superb story
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