बिछड़ना(कविता )

 बिछड़ना


तुमसे मेरा बिछड़ना तय था,
मालूम था मुझे,
कि तुमसे मिलना ना हो पाएगा।
फिर भी जाने क्यों,
बार-बार तुझ पर आकर
रुक जाता है ये दिल।

तेरे दीदार की ख्वाहिश थी,        
जो बार-बार तेरे दर पर
चले आते थे हम।
वरना फुर्सत के पल
मेरे पास भी कहाँ थे।

जाना ही था तो चले जाते तुम,
बस एक बार मुझे बता तो देते।
यूँ बार-बार नज़रों को मायूस तो न होना पड़ता
तेरे इंतज़ार में।
तुम्हारी यादें अब भी मेरे साथ हैं।




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