"एक प्यार का एहसास, जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी"
"एक प्यार का एहसास, जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी"
"थोड़ी खामोशी और थोड़ी बेचैनी के साथ
बार-बार नजरें घुमा कर दरवाजे की ओर देख रही थी श्यामा। श्यामा को लग रहा था कि
अभी राजवीर कमरे के अंदर आएंगे और श्यामा को अपनी बाहों में भर कर कहेंगे, 'अरे श्यामल, मैं हूं न, मैं सब ठीक कर दूंगा, तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।' लेकिन श्यामा अच्छी तरह जानती थी कि
राजवीर अब कभी वापस नहीं आएंगे। वे तो इतनी दूर जा चुके थे, जहां से कोई वापस नहीं लौटता है।
यह ख्याल आते ही
श्यामा की आंखों से आंसू की दो बूँद लुड़क कर गालों से होते हुए हथेलियों पर गिर
जाती हैं। श्यामा के दिल में एक कसक सी उठती है। श्यामा को लगता है कि वह जोर-जोर
से रोए, लेकिन तभी 'मां' की आवाज सुनकर श्यामा का ध्यान उस आवाज
पर चला जाता है।
श्यामा का 17 साल का बेटा मुकुंद हाथों में एक कागज
पकड़े खड़ा था। मुकुंद को सामने देख कर श्यामा झट से अपने आंचल से आंसू पोंछती है
और खुद को संभालते हुए बोलती है, "क्या बात है
मुकुंद, यह कैसा कागज है तुम्हारे हाथों में?"
मुकुंद -
"मां, ये एलआईसी का कागज है, जिस पर आपकी साइन चाहिए।"
श्यामा आश्चर्य से
- "एलआईसी?"
मुकुंद -
"हाँ मम्मी, पापा ने 5,00,000 का LIC कराया था अजित अंकल से। वही पैसा निकालने
के लिए इस कागज पर आपके साइन चाहिए।"
मुकुंद की बात
सुनकर श्यामा कुछ देर के लिए स्तब्ध होकर अपनी जगह पर खड़ी रह जाती है। श्यामा मन
ही मन सोचने लगती है, तो राजवीर हर दो महीने में शहर जाकर LIC भरने जाते थे। वो ना जाने क्या-क्या बोलकर हमेशा इन पैसों के लिए राजवीर
से लड़ती रहती थी। यह सोचकर श्यामा की आंखों में एक बार फिर आंसू आ जाते हैं।
मुकुंद अपनी मां
को चुपचाप खड़े देख कर कहता है, "क्या हुआ मम्मी? साइन करो न, अजित अंकल को देर हो रहा है।"
मुकुंद की बात
सुनकर श्यामा अपने आंचल से आंसू पोंछती है और मुकुंद के हाथों से कागज ले कर उस पर
साइन कर देती है। मुकुंद एक नजर अपनी मम्मी की ओर देखता है, शायद मुकुंद को भी अपनी मम्मी के जज्बात
का आभास था, लेकिन... मुकुंद एक गहरी सांस लेकर अपनी
मम्मी के हाथों से कागज लेता है और कमरे से बाहर निकल जाता है।
श्यामा वहीं कमरे
में धम्म से जमीन पर बैठ जाती है और नीचे सिर किए जमीन को घूरने लगती है।
अभी थोड़ी देर
पहले श्यामा ना जाने कितनी चिंता में थी - राजवीर के जाने के बाद मुकुंद की पढ़ाई
के लिए पैसे कहां से लाएगी, मुन्नी की शादी कैसे करेगी, कहां से लाएगी इतने सारे पैसे? लेकिन राजवीर का LIC एक पल में उसकी सारी चिंताएं दूर कर देता
है। श्यामा को ऐसा लगता है जैसे राजवीर उसे अपनी बाहों में भर कर कह रहे हों, 'मैंने कहा था न श्यामल, तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, मैं हूं न, सब ठीक कर दूंगा।'
लेखिका-अल्पना सिंह
Nice story
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