लघु कथा - तौर-तरीका
“आशी, तुमने फिर इस कपड़े में अपना मुँह पोछ लिया? कितनी बार कहा है, जब भी तुम अपना मुँह और हाथ धोती हो तो उसे तौलिये से ही पोछो, लेकिन इस तरह से नहीं। तुम्हारे पापा को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं है, तुम जानती हो न?”
आशी की मम्मी ने थोड़ी सी नाराजगी से कहा, “दीदी, आशी के पापा को ये सब बिल्कुल भी पसंद नहीं आता। वह हमेशा मुझे यही समझाते रहते हैं कि बच्ची को अच्छे तौर-तरीके सिखाओ। लड़का नहीं, लड़की है, ब्याह कर दूसरे के घर जाना है। अच्छे तौर-तरीके नहीं सिखाओगी तो आगे जाकर उसे तकलीफ होगी।”
आशी की मम्मी ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि आशी की मौसी गुस्से में बोलीं, “दूसरे के घर जाने का क्या मतलब है? जाना है तो जाना है, और बार-बार छोटी बच्ची को ये सब समझाने की क्या जरूरत है?”
फिर आशी की मौसी ने प्यार से आशी को पास बुलाया और मुस्कुराते हुए बोलीं, “आशी बेटा, दूसरे के घर जाना है, इस सोच से डरने की जरूरत नहीं है। बस मेरी एक बात हमेशा याद रखना – जब तुम्हारी सास तुम्हें किसी गलती पर डांटे, तो समझ लेना कि तुम्हारी मम्मी तुम्हें डांट रही हैं। वैसे ही हंसते हुए उनकी बातों को टाल देना, जैसे तुमने अभी अपनी मम्मी की बातों को हंसी में टाल दिया। फिर देखो, सारा मामला सुलझ जाएगा।”
आशी ने अपनी मौसी की बातों को सुनकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और धीरे-धीरे हंसने लगी।
लेखिका - अल्पना सिंह
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