लो फिर आ गया महापर्व छठ



लो फिर आ गया महापर्व छठ

आ गया एक बार फिर महापर्व छठ। एक बार फिर मिलेगा देखने को वो अलौकिक दृश्य, जो अनेकताओं में एकता का प्रतीक है। सभी जाति-पात, ऊँच-नीच को भुलाकर, सभी लोग एक घाट पर एकत्र होंगे, उनके दर्शन के लिए। सभी धर्मों के लोग, किसी न किसी रूप में, इस महापर्व से जुड़ेंगे—चाहे व्यापारी हों या पुजारी। खुशियाँ हर घर में किसी न किसी रूप में आएँगी।

एक बार फिर हमें जीवन की उस सच्चाई का सामना करना है—यदि शाम है, तो सुबह भी होगी। सूर्य उगते हैं, तो अस्त भी होते हैं, और जो अस्त होते हैं, वे पुनः उगते हैं। जीवन में दुःख आता है, तो सुख भी अवश्य आएगा। सुख के बाद दुःख, दुःख के बाद सुख, सफलता के बाद असफलता, या असफलता के बाद सफलता—यह जीवन का क्रम है। आशा और निराशा, जीवन और मृत्यु के भेद को लेकर, फिर आ गया ये छठ महापर्व।

यह महापर्व हमारी कल्पनाओं से परे भी बहुत कुछ सिखाता है। यह हमें हमारी सभ्यता और संस्कृति से जोड़ता है, हमारे परिजनों से मिलवाता है, और समाज के हर वर्ग का महत्व सिखाता है। हम अपने जड़ से जुड़ते हैं। सभी भेदभाव—ऊँच-नीच, अमीर-गरीब—को भुलाकर हम सभी एक साथ, उस नीले आसमान के नीचे, हाथ जोड़े जल में खड़े होते हैं। शुद्ध वायु का सेवन करते हुए, अग्नि का आह्वाहन करते हैं। एक बार फिर हम उस ईश्वर से, परम पिता परमेश्वर से जुड़ जाते हैं।

लो, फिर आ गया यह छठ महापर्व, हमें हमारे अस्तित्व की पहचान कराने के लिए।

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