"कुछ अधूरी सी ज़िंदगी"



 



कुछ अधूरी-सी ज़िंदगी

कुछ खालिस से अधूरे ख्वाब हैं,
जो ना हँसने देते हैं... ना खुलकर रोने देते हैं।
कुछ चाहतें हैं, अधूरी-सी धड़कती,
जो ना गहरी नींद सोने देती हैं, ना चैन से जागने देती हैं।

ज़िंदगी के कुछ पुराने हिसाब अधूरे हैं,
जो ना खुलकर जीने देते हैं,
ना ही कोई नई राह सोचने देते हैं।

शायद इन्हीं टुकड़ों की वजह से —
हर रोज़ ये ज़िंदगी...
थोड़ी-थोड़ी अधूरी लगती है।

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