आज... सिर्फ़ प्रेम की बात करें।

 

आज... सिर्फ़ प्रेम की बात करें।    

 चलो, उन दिनों की बात करें       

जब नज़रों में ही नज़रों से प्रेम हुआ करता था,
दिल ने बिना कहे धड़कनों की भाषा समझी थी,
और आँखों के इशारों में अनकहे जज़्बात पलते थे।

कुछ वादे थे अधूरे से, पर बेहद सच्चे,
जिनमें सिर्फ़ चाहत थी,
न कोई बंधन, न कोई सवाल,
न समाज की कसौटी, न ही किसी आलोचना की गुंजाइश।

चलो, उन मुलाकातों को फिर से याद करें
जो चोरी-चोरी, चुपके-चुपके हुई थीं,
जहाँ खनकते हँसी के सुर थे
और छुपे हुए गीतों की मिठास थी।

चलो, बात करें उस मखमली धूप की,
जो किसी की मुस्कान जैसी लगती थी,
उस नरम छाँव की,
जो किसी अपने की बाँहों जैसा सुकून देती थी।

आज फिर बात करें गुलाबी सुबहों की, सिन्दूरी शामों की,
महकते फूलों और झूमती डालियों की,
उन चांदनी रातों की,
जहाँ जज़्बात बहकते थे,
और प्रेमबस प्रेम बोलता था।

आज... सिर्फ़ प्रेम की बात करें।

 

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