जिंदगी का सफ़र,
जिंदगी का सफ़र
जिंदगी बड़ी अजीब है,
बिना किसी लक्ष्य के शुरू होती है।
ना कुछ सोच, ना कुछ समझ —
धीरे-धीरे मस्तिष्क विकसित होता है,
और तब जाकर लक्ष्य तय होते हैं।
आँखें सपने देखती हैं,
और बावला मन उन सपनों के पीछे भागता है।
दोनों बाँहें फैलाकर,
खुले आसमान में उड़ने की चाह जगती है।
ना जाने कितने झूठ, कितनी तरकीबें,
कितने जुगाड़ लगाती ये ज़िंदगी,
रेस के घोड़े की तरह दौड़ती चली जाती है।
कुछ मंज़िलें हासिल होती हैं,
कुछ सपने टूट जाते हैं।
कभी अपनों से जुड़ती है ये ज़िंदगी,
तो कभी बिखर कर रह जाती है।
और अंत में—
फिर एक बार लक्ष्यविहीन हो जाती है ज़िंदगी।
क्या पाया, क्या खोया — सब भुला देती है,
शून्य में तकती, खाली हाथ और खाली सपनों संग
अपने अंत की तलाश करती है...
यूं ही पूरे होते हैं
ज़िंदगी के ये अनकहे सफ़र।
Written by- Alpna singh



Bhut hi achi
ReplyDeletebhut hi achi poem
ReplyDelete