मेरी नई किताब — “मर्यादा”
मेरी नई किताब — “मर्यादा”
“मर्यादा” लिखना मैंने 2017 में ही शुरू कर दिया था।
तब मेरे पास इस तरह की कोई कहानी लिखने की योजना नहीं थी। मैं “नीलमणि” और “श्रीधर पंडित” लिखने में व्यस्त थी। तभी एक ऐसी घटना घटी, जिसने मुझे भीतर तक हिला दिया।
मेरे एक करीबी रिश्तेदार के साथ हुई घरेलू हिंसा की उस घटना ने मुझे बहुत गहराई तक झकझोर दिया था। लेकिन उस घटना से भी ज्यादा मुझे अपने आसपास की महिलाओं की सोच ने परेशान किया था—घरेलू हिंसा को सही ठहराना, उसे सहना और फिर उसी सहने को स्त्री का धर्म मान लेना।
मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पाती थी।
शायद इसलिए मेरी कलम अनायास ही डायरी के पन्नों पर चलने लगी।
मैं जब अविवाहित थी, तब अपने घर में घरेलू हिंसा का वैसा रूप मैंने नहीं देखा था। गुस्सा मैंने देखा था। मेरे पापा गुस्से वाले थे और मेरी माँ उतनी ही सहनशील। हमारे घर में दादाजी का अनुशासन था, दादी का स्नेह था। हम संयुक्त परिवार में रहते थे और परिवार में शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता था।
लेकिन मारपीट जैसी घटना—नहीं, बिल्कुल नहीं।
शायद इसीलिए जब मैंने अपने आसपास ऐसी घटनाएँ देखीं, तो उन्हें स्वीकार कर पाना मेरे लिए और भी मुश्किल था।
और फिर मेरी डायरी में “मर्यादा” जन्म लेने लगी।
लेकिन इसे पूरा होने में पूरे दस साल लग गए।
दस साल तक “मर्यादा” मेरी डायरी के पन्नों में बंद रही।
एक समय मुझे लगा कि अब यह विषय पुराना हो गया है। लोग पहले से ज्यादा शिक्षित हो गए हैं। घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून हैं, जागरूकता है, इस विषय पर बातें होती हैं… शायद अब ऐसी कहानी लिखने की जरूरत नहीं रही।
लेकिन शायद मैं गलत थी।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर सामने आती कई घटनाओं ने मुझे फिर सोचने पर मजबूर किया।
घरेलू हिंसा खत्म नहीं हुई है।
शायद उसने सिर्फ अपना रूप बदल लिया है।
उसकी जड़ें आज भी हमारे समाज में बहुत गहरी हैं।
तब मैंने अपनी वही पुरानी डायरी निकाली और “मर्यादा” को फिर से पढ़ना शुरू किया।
और इस बार उसे अधूरा छोड़ना नहीं चाहती थी।
आज वही कहानी एक किताब बनकर मेरे हाथों में है।
मैंने इस पोस्ट के साथ जानबूझकर कोई तस्वीर नहीं लगाई है।
क्योंकि मैं जानती हूँ—हम अक्सर तस्वीर देखकर रुकते हैं, एक टिप्पणी करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।
लेकिन “मर्यादा” के साथ मेरी इच्छा थोड़ी अलग है।
इसे कम लोग देखें, लेकिन जो देखें… वे इसे पढ़ें।
मैं चाहती हूँ कि मेरी किताब को सिर्फ देखा न जाए, उसे समझा जाए।
इस कहानी को मैंने एक ऐसा अंत देने की कोशिश की है, जो शायद हमारी वास्तविक सामाजिक व्यवस्था में अक्सर देखने को नहीं मिलता।
क्योंकि कभी-कभी लेखक को केवल वही नहीं लिखना चाहिए जो समाज में हो रहा है…
कभी-कभी उसे वह अंत भी लिखना चाहिए, जिसकी जरूरत समाज को है।
“मर्यादा” — मेरी डायरी के पन्नों से किताब तक का दस वर्षों का सफर।
— अल्पना सिंह ✍️



Bhut hi achi khani
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